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असम के दो जिलों पर बांग्‍लादेशियों का कब्‍जा!

Assam
दिल्ली (राजेश केशव)। 15 साल पहले टाइम्स आफ इंडिया में एक खबर छपी थी कि बांग्लादेश सीमा के पास बसे बांग्लादेशी मुसलमानों में आबादी बढ़ाने की होड़ मची हुई है। कई ऐसे लोग थे जिनके कई पत्नियां थी उनको बच्चों की संख्या 50 से ज्यादा थी। ज्यादातर लोगों ने स्वीकार किया था कि उन्हें बच्चों की संख्या ही याद नहीं। बच्चों का क्या नाम है वे कैसे रहते हैं, उन्हें भोजन भी मिलता है या नहीं इसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं थी। मकसद सिर्फ एक था आबादी बढ़ा कर असम में वर्चस्व स्थापित करना।

आज उसका खतरनाक परिणाम सामने आ गया है। मेरठ कॉलेज के रक्षा अध्ययन विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. संजय कुमार ने असम पर शोध किया है। जो परिणाम शोध में आए हैं वो भयावह हैं। कामरूप और कछार में क्षेत्रीय जाति बहुसंख्यक से ‘अल्पसंख्यक’ हो गई हैं। इस वजह से भी लोगों में खासा रोष है। असम में 1955 में 95 प्रतिशत क्षेत्रीय लोग थे। 1971 में ये घटकर आधे रह गए। 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद अब क्षेत्रीय लोगों की संख्या महज करीब 36 फीसदी रह गई है। ज‍बकि बांग्‍लादेशियों समेत बाहरी लोगों की संख्‍या 64 फीसदी तक पहुंच गई है। यानी यह कहना गलत नहीं होगा कि इन दोनों जिलों में बांग्‍लादेशियों ने धीरे-धीरे पैठ जमाकर कब्‍जा कर लिया है।

डा. संजय कुमार के मुताबिक केंद्र और राज्य सरकार ने अगर ध्यान नहीं दिया तो असम के हालात देश की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन जाएंगे। इस बात का खुलासा मेरठ कॉलेज के एक शिक्षक के शोध में हुआ है। शोध के मुताबिक असम देश को मौत के सामान बांट रहा है। इसमें हथियार, ड्रग्स और एड्स शामिल है। इससे असम को भी खतरा है। यहां क्षेत्रीय जाति बहुसंख्यक से ‘अल्पसंख्यक’ हो गई हैं।

इस वजह से भी लोगों में खासा रोष है। मेरठ कॉलेज के रक्षा अध्ययन विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. संजय कुमार ने असम पर शोध किया है। यूजीसी के करीब साढ़े छह लाख रुपये की मदद से डॉ. संजय ने ‘असम का जातीय संघर्ष और भारतीय सुरक्षा: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन’ विषय पर तीन साल (2008 से 2011) तक शोध किया। इसके लिए असम के दो जिले कामरूप और कछार को चुना गया। रिसर्च में 601 लोगों पर सर्वे किया गया।

सर्वे में सेना अधिकारी, राजनेता, जिलाधिकारी, विशेषज्ञ, एनजीओ, सभासद, ग्रामीण और शहरी लोगों को शामिल किया गया। रिसर्च के मुताबिक चीन, बांग्लादेश, म्यांमार और पाकिस्तान जातीय समूह (बोडो, नागा, असमी और कुकी) को आर्थिक और सैन्य प्रशिक्षण दे रहे हैं। पाकिस्तान बांग्लादेश के बॉर्डर पर प्रशिक्षण शिविरों की संख्या लगातार बढ़ा रहा है। आईएसआई असम में छह इस्लामी उग्रवादी संगठनों की मदद कर रही है। नशे के शिकार युवा एड्स की गिरफ्त में आ रहे हैं।

सर्वे की एक अहम बात यह है कि क्षेत्रीय जाति असम में बहुसंख्यक से ‘अल्पसंख्यक’ हो गई हैं। असम में 1955 में 95 प्रतिशत क्षेत्रीय लोग थे। 1971 में ये घटकर आधे रह गए। 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद अब क्षेत्रीय लोगों की संख्या महज करीब 36 फीसदी रह गई है। 64 फीसदी बाहरी लोग हैं, जिनमें सबसे ज्यादा बांग्लादेशी हैं। आर्थिक विकास न होने और राजनीतिक उदासीनता की वजह से यह हालात हुए हैं। शोध पर दिल्ली के मोहित पब्लिकेशन ने असम में नृजातीय संघर्ष और भारतीय सुरक्षा नाम से हाल में किताब भी प्रकाशित की है।

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