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बलवंत सिंह को फांसी पर पंजाब में उबाल क्‍यों?

Riots
डा. आलोक चांटिया

पंजाब से खबर आयी कि यहां बलवंत सिंह की फांसी पर रोक लगाये जाने के बाद से लोगों में रोष बढ़ गया है। इसी बीच पंजाब में जबर्दस्‍त उबाल के बीच कई जिलों में कर्फ्यू लगाना पड़ा है। कई हिस्‍सों में भड़के दंगों के बीच एक युवक की मौत भी हो गई है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर बलवंत सिंह को फांसी पर पंजाब में उबाल क्‍यों आया है?

सवाल इसलिए वाजिब है क्‍योंकि उच्चतम न्यायलय का आदेश आना बाकी है और संविधान के अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति की क्षमा याचना आना भी बाकी है।

ऐसे में यह भी जनना होगा कि 1 अगस्त 2007 से एक आदमी जिंदा है, जिसे मर जाना चाहिए था। मैंने राष्ट्रपति कार्यालय से सुचना भी मांगी कि आखिर कब तक हत्यारों को जिंदा रख कर देश का पैसा और जनता से पैसा का दुरपयोग करने का प्राविधान है। पर आज तक उसका उत्तर नहीं दिया गया। जिस देश में हत्या करने के बाद कोर्ट और राष्ट्रपति की क्षमा याचना के प्राविधान के सहारे एक अपराधी बीस-बीस साल जिन्दा रखा जा सकता हो, उस देश में अपराध बढ़ना स्वाभाविक है।

इस तरह आम जनता में यह संदेश जा रहा है कि देश में अपराधियों को ज्यादा संरक्षण है और इसीलिए उन्हें किसी तरह जिंदा रहने के लिए काम करना चाहिये क्योकि न्याय के नाम पर एक अपराधी तो वर्षो जिंदा रह सकता है पर जिस का घर उजड़ गया उसके लिए न्याय क्या हो? इसके लिए देश मौन है और यही कारण है कि विगर में अपराध बढ़ा है और लोगो में डर बढ़ा है और इसने भ्रष्‍टाचार को बढ़ाने में भी मदद की है।

इसलिए गलत करने वालों को तुरंत फांसी हो और यही कानून हर जगह मान्य होना चहिये, क्यों कि एक तरफ देश की जनता को इसलिए उकसाया जा रहा है कि भष्‍टाचार है और दूसरी तरफ एक हत्यारे को बचाने के लिए यह कहकर उकसाया जा रहा है कि देश में कानून का कोई मतलब नहीं है। कुल मिलाकर देखा जाये तो देश की सीधी साधी जनता को यहां भड़काया जा रहा है।

लेखक परिचय- डा. आलोक चांटिया, ऑल इंडिया राइट्स ऑर्गनाइजेशन (एआईआरओ) के अध्‍यक्ष, लखनऊ के श्री जेएनपीजी कॉलेज में रीडर हैं।

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