केंद्र में सपा की हनक क्‍या रेल पर बिठा पायेगी मुलायम को?

Mulayam Singh Yadav
लखनऊ। यूपी में समाजवादी पार्टी की सरकार बनते ही केन्द्र में भी पार्टी की हनक बढ़ गयी है। इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जो कांग्रेस पार्टी कल तक सपा से दूर भाग रही थी अब सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव को रेल मंत्री बनाने पर विचार कर रही है। सूत्रों की मानें तो तृण मूल कांग्रेस के निरंतर बढ़ते दबाव से निजात पाने और मनमोहन सिंह सरकार को अगले दो साल के लिए राजनीतिक संकटों से बचाने के लिए संप्रग ने यह कवायद तेज कर दी है।

सत्तारूढ़ खेमे की ओर से सपा का समर्थन जुटाने की मुहिम पर्दे के पीछे चल रही है और इसके लिए रेल मंत्रालय एक तुरूप का पत्ता बन गया है। सूत्रों की मानें तो मुलायम सिंह को रेल मंत्रालय देने के अलावा सत्तारूढ़ खेमा सपा को राज्यसभा के उपसभापति के साथ-साथ उपराष्ट्रपति का पद भी देने को तैयार है, लेकिन इसके बदले में कांग्रेस राष्ट्रपति पद पर अपने उम्‍मीदवार के लिए सपा से बिना शर्त समर्थन चाहती है। उपसभापति पद के लिए सपा के चाणक्य माने जाने वाले राम गोपाल यादव का नाम चर्चा में आ चुका है। उपराष्ट्रपति के लिए अपना उम्‍मीदवार सामने लाकर सपा राष्ट्रीय राजनीति में पूरी तरह काबिज हो सकती है।

मनमोहन सिंह सरकार को सपा का समर्थन तृणमूल कांग्रेस के बजाए ज्यादा सटीक और फायदे का बेठता है क्यों कि सपा हर मुद्दे पर सरकार को दबाव में नहीं लेगी। इसका कारण यह है कि मुलायम सिंह के सामने ममता बनर्जी की तरह वामपंथियों की रोज-रोज की राजनीतिक चुनौती नहीं है। अपने अभूतपूर्व बहुमत के बल पर उत्तर प्रदेश में सपा के लिए वैसी चुनौती नहीं है और तृणमूल के 19 के बजाए सपा के 22 सदस्यों का लोकसभा में सरकार को सहारा मिल जाएगा।

दूसरी ओर मुलायम ङ्क्षसह यादव बढ़ा हुआ रेल बजट अपने हाथों से पारित कराने को तैयार नहीं हैं। सरकार के पास इसका इलाज है कि वह दिनेश त्रिवेदी को बजट सत्र का आधा हिस्सा पूरा होने तक रेल मंत्री बनाए रखेगी। इससे रेल बजट दिनेश त्रिवेदी के नेतृत्व में पारित होने और 30 मार्च के बाद मुलायम सिंह के रेल मंत्री बनने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा। मुसीबत के समय में मुलायम पहले भी संप्रग सरकार का साथ दे चुके हैं।

उल्लेखनीय है कि 2008 में अमेरिका से परमाणु करार के मुद्दे पर जब वामपंथी दलों ने मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया तो सपा के समर्थन से ही सरकार का बाकी कार्यकाल पूरा हुआ था। उस समय उत्तर प्रदेश के चुनाव में अपने मुस्लिम मतदाताओं के रूठने के डर से सपा केंद्र की सरकार में शामिल नहीं हुई थी। लेकिन इस बार के चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं का सपा को भरपुर समर्थन ही नहीं मिला बल्कि यह भी देखने में आया कि उनका गुस्सा अब कांग्रेस के प्रति भी नहीं रहा है। इस वजह से सपा की केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल होने की हिचक भी दूर हो गई है।

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