उधार के पैसों से रफ्तार भरेगी भारतीय रेल

रेलवे को किराया बहुत ज्यादा बढ़ा कर धन इकट्ठा करने की जगह धन के लिए दूसरे रास्ते तलाशने चाहिए थे। जैसे अपनी खाली पड़ी जमीन पर माल होटल या इस दूसरे तरह दूसरे विकास का काम, लेकिन इस दिशा में कुछ नहीं हो रहा है।
लालू के जमाने में बजट होटल का प्रस्ताव आया था, लेकिन उसपर कुछ नहीं हुआ। हार कर हताश आदमी की तरह रेल मंत्री ने पैसा इक्टठा करने के लिए दुनिया का सबसे खराब रास्ता उधार का सहारा लिया है।
रेलवे ने दस साल बाद रेल किराये में बढ़ोतरी की है। रेल किराए में 2 पैसे से 30 पैसे की बढ़ोतरी की गई है। सेकेंड क्लास में 35 किलोमीटर के लिए दो पैसे की बढ़ोतरी की गई है। एसी-1 में 30 पैसे प्रति किलोमीटर बढ़ाया गया है।साथ ही एसी-2 में 20 पैसे प्रति किलोमीटर बढ़ाया गया है। साधारण किराया 2 पैसे प्रति किलोमीटर बढ़ाया गया है। एसी-3 टीयर में 10 पैसे प्रति किलोमीटर की बढ़ोतरी की गई है। सेकेंड क्लास एसी में 15 पैसे प्रति किलोमीटर की दर से बढ़ाया गया है। इससे अच्छा खासा इनकम होगी, लेकिन यह रेलेवे के हालत बदलने लायक नहीं है। हकीकत तो यह है कि भारतीय रेलवे की जो स्थिति है उसमें जगह का पूरा उपयोग और कर्मचारियों का दबाव कम कर के आसानी से यात्रियों को राहत दी जा सकती है। महीने भर पहले 17 फरवरी को परमाणु ऊर्जा आयोग के चेयरमैन अनिल काकोदकर की अध्यक्षता में बने विशेषज्ञ दल ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था रेलवे की हालत बदतर है। उनका कहना था कि भारतीय रेल को सुरक्षित यात्रा के मानकों को पूरा करने के लिए करीब एक लाख करोड़ रुपए लगाने होंगे। इसके दस दिन बाद 27 फरवरी को राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के चेयरमैन सैम पित्रोदा की अध्यक्षता में बने दल ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि भारतीय रेल को आधुनिकीकरण के लिए अगले पांच सालों में 5.6 लाख करोड़ रुपए की जरूरत पड़ेगी।
रेलवे मंत्री को लग गया था कि दो साल बाद आम चुनाव है। किराया बढ़ाने की एक सीमा होती है। उस सीमा को रेलवे ने कर दिया। लेकिन इससे ज्यादा भला नहीं होनेवाला था। आखिरी रास्ता रेलवे ने उधार का उठाया है। दिनेश त्रिवेदी ने कहा कि रेलवे को साल 2012-13 में बाजार से 500 बिलियन रुपये उधार लेने होंगे। इसी से समझ सकते हैं कि रेलवे के हालात कितना खतरनाक है। कर्मचारियों का बोझ इस कदर है कि विश्व बैंक ने दस साल पहले बताया था कि रेलवे में तीस से चालीस फीसदी लोग फालतू हैं। जाहिर है कोई संस्थान अगर इतने फालतू लोगों को ढोएगा, दस साल किराया नहीं बढ़ाएगा तो ये दिन रेलेवे को देखने ही थे। जब उधार लेकर रेलवे को चलाना पड़ेगा। हालांकि चालू वित्त वर्ष में रेलवे की कमाई बहुत बुरी नहीं रही है। पूरे वित्त वर्ष के लिए कुल माल ढुलाई का लक्ष्य 99.30 करोड़ टन था। इसमें से फरवरी अंत तक 87.56 करोड़ टन का ढुलाई हो चुकी है। हां, यात्रियों की संख्या में 6.4 फीसदी वृद्धि का अनुमान था, लेकिन फरवरी तक इसमें 5.21 फीसदी वृद्धि ही हुई है। सबसे बड़ी चिंता की बात है रेलवे के खर्च का बढ़ते जाना। वह एक रुपए कमाने के लिए जितना खर्च करती है, वो हिस्सा बढ़ता जा रहा है। इसे परिचालन अनुपात कहते हैं। 2008-09 में यह अनुपात 75.9 फीसदी था। यानी 100 रुपए कमाने पर रेलवे 75.9 रुपए खर्च कर रही थी। 2009-10 में यह अनुपात 95.3 फीसदी और 2010-11 में 92.3 फीसदी रहा है। चालू वित्त वर्ष 2011-2 के लिए इसका बजट लक्ष्य 91.1 फीसदी का है।
ममता बनर्जी ने 25 फरवरी 2011 को वित्त वर्ष 2011-12 का रेल बजट पेश करते वक्त 57,630 करोड़ रुपए के आयोजना व्यय का लक्ष्य रखा था। इसमें से भारतीय रेल को आंतरिक स्रोतों से 14,219 करोड़ रुपए लगाने थे, डीजल पर अधिभार से 1041 करोड़ रुपए मिलने थे और पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) परियोजनाओं के जरिए बाहरी स्रोतों से 1776 करोड़ रुपए जुटाए जाने थे। इसमें से कितना हुआ, यह तो पता नहीं। लेकिन इतना पता है कि भारतीय रेल वित्त निगम (आईआरएफसी) को उधार के रूप में जो 20,594 करोड़ रुपए जुटाने थे, उसमें से वह 14,500 करोड़ रुपए ही जुटा पाया है। इसमें से उसे 10,000 करोड़ रुपए टैक्स-फ्री बांडों से जुटाने थे। लेकिन टैक्स-फ्री बांडों को मिले भारी समर्थन के बावजूद इनसे 7000 करोड़ रुपए ही जुट सके हैं। अब रेलवे ने आखिरकार उधार का रास्ता अपनाया है।












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