बेटे की जिद्द के कारण कल्याण का कैरियर खत्म
कल्याण ने सूबे में दो सौ से ज्यादा सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। अलीगढ़ की सातों सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। अतरौली से तो खुद उनकी पुत्रवधू प्रेमलता वर्मा ही उनकी सियासी विरासत को आगे संभालने जा रही थीं। लेकिन, जिस सीट पर कल्याण ने नौ बार जीत हासिल की, वहां पुत्रवधू इस बार हार गईं। कल्याण सिंह के खुलेआम दावे तो 15 सीटों पर जीत के थे, लेकिन पांच सीटें पक्की दिख रही थीं। इसमें एक तो खुद अतरौली की थी और दूसरी डिबाई की। डिबाई से उनके पुत्र राजू भैया मामूली अंतर से चुनाव हार गए। खुद अतरौली सीट भी गई।
वैसे, कल्याण ने भाजपा को हराने के लिए पूरे घोड़े खोल रखे थे। ये और बात है कि कल्याण खुद के प्रत्याशियों का 'कल्याण' नहीं कर पाए, लेकिन भाजपा का नुकसान खूब किया। बेटे-बहू के अलावा भी दो सीटों पर उनके प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे। कल्याण के लिए ये चुनाव तमाम चुनौतियों भरा था। इसी कारण पूरे चुनाव की कमान खुद कल्याण ने अपने हाथ में रखी। चुनिंदा प्रत्याशियों के समर्थन में कल्याण खुद हेलीकॉप्टर लिए घूमे। एक-एक वोट का महत्व समझाया। अलीगढ़-आसपास की सीटों पर तो पूरा हफ्ता ही बिताया था। इसका असर भी हुआ।
भाजपा तो कई सीटों पर हारी ही, कुछ दिग्गजों की हार के कारण भी कल्याण ही बने। जेकेपी के प्रत्याशी भू-प्रकाश माहौर ने 11,797 वोट हासिल किए। इसका खामियाजा भाजपा को झेलना पड़ा। बरौली में आरईडी मंत्री ठा. जयवीर सिंह की हार के पीछे भी जेकेपी प्रत्याशी केशव बघेल बने। वहां बघेल मत परंपरागत रूप से बसपा को मिलते रहे थे, लेकिन अबकी लोध और बघेल मतों का ध्रुवीकरण जेकेपी की ओर हो गया।
नतीजा ये कि रालोद के ठा. दलवीर सिंह ने बाजी मार ली। छर्रा सीट पर डॉ. राम सिंह की हार के पीछे जेकेपी ही है। वहां लोध मतों को मनाने के लिए खुद कल्याण गए थे और वो मत ठा. रवेंद्रपाल सिंह के पाले में गया। डॉ. राम सिंह को कमजोर देख भाजपा का परंपरागत वोट सपा की ओर खिसक गया। कोल में भाजपा का टेम्पो नहीं बन पाने के पीछे भी जेकेपी का बड़ा योगदान रहा है।
डिबाई सीट पर भाजपा उम्मीदवार रविंद्र सिंह को 3419 वोट मिल सके। इससे करारी हार भाजपा प्रत्याशी की और क्या हो सकती है? इससे बेहतर वोट तो दो निर्दलीय प्रत्याशियों को मिले। कल्याण सिंह यदि भाजपा में होते तो उनकी पार्टी का एकमुश्त वोट 59372 भाजपा उम्मीदवार को मिलता। जिससे भाजपा की स्थिति काफी मजबूत होती।
पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का विधानसभा चुनाव में जादू नहीं चला। उनकी प्रतिष्ठा से जुड़ी डिबाई सीट भी उनके साथ नहीं आ सकी। उनके बेटे राजबीर को लोधी बाहुल इस सीट पर एक बार फिर हार का मुंह देखना पड़ा। स्याना सीट पर भी मजबूत माने जा रहे सुंदर सिंह का भी लोधी मतदाताओं ने साथ तो दिया लेकिन अन्य वर्ग की वोट वह नहीं ले सके। इतना जरूर है कि कल्याण सिंह के प्रत्याशियों ने कई सीटों पर भाजपा की लुटिया जरूर डुबो दी।













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