माया और मुलायम को एक घाट पर पानी पिलाने की कोशिश
खबर चौंकाने वाली है, लेकिन उत्तर प्रदेश की सियासत में कई बार मौकापरस्ती ने गुल खिलाए हैं जब अपने हितों के लिए सिद्धांत, मुद्दे और मतभेद सब भूलकर परस्पर विरोधी ध्रुव एक साथ हो गए हैं। कभी अयोध्या मुद्दे पर एक दूसरे के खिलाफ बयानों और भाषणों के गोले दागने वाले मुलायम सिंह यादव और कल्याण सिंह की दोस्ती और अलगाव कोई बहुत पुराना नहीं है। ताजा कोशिश हो रही है प्रदेश की राजनीति के दो कट्टर सियासी दुश्मन मुलायम सिंह यादव और मायावती के बीच दोस्ती कराने की।
सूत्रों के मुताबिक यह कोशिश दोनों नेताओं के करीब रह चुके एक उद्योगपति की है, जो चाहते हैं कि चुनाव बाद अगर त्रिशंकु विधानसभा का फायदा उठाकर केंद्र सरकार राष्ट्रपति शासन लगाने की कोशिश करे तो उसके खिलाफ सपा और बसपा एक साथ आकर राज्य विधानसभा में 1993 का इतिहास दोहरा दें। हालाकि अधिकृत रूप से सपा और बसपा दोनों ही दलों के वरिष्ठ नेता ऐसी किसी भी संभावना से इनकार करते हैं, क्योंकि दोनों की राजनीति एक दूसरे के विरोध पर टिकी है।
सूत्रों के मुताबिक हाल ही में दक्षिण दिल्ली के छतरपुर इलाके में एक फार्म हाउस में हुई बैठक में यह सलाह मशविरा हुआ। दिलचस्प और चौंकाने वाली बात यह है कि इस बैठक में मायावती और मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी दो लोग मौजूद थे। उत्तर प्रदेश में अपनी तमाम परियोजनाओं के लिए मशहूर इस उद्योगपति के भाई के फार्म हाउस पर यह बैठक हुई। बैठक में तय हुआ कि नतीजों के मुताबिक दोनों दल अपनी-अपनी सरकार बनाने की कोशिश करेंगे, लेकिन एक दूसरे प्रति बदले की भावना नहीं रखेंगे।
त्रिशंकु विधानसभा होने और सरकार न बनने की स्थिति में कांग्रेस द्वारा राष्ट्रपति शासन लगाने के पुरजोर विरोध और तब कोई रास्ता निकालने की बात भी हुई। सूत्रों के मुताबिक बैठक में सीबीआई के जरिए कांग्रेस सपा और बसपा पर दबाव बनाकर अपना मतलब निकालती है, उससे भी मिलकर लडऩे
की जरूरत पर चर्चा हुई। हालांकि अभी अंतिम रूप से कुछ भी तय नहीं हुआ है और जल्दी ही दूसरी बैठक करने पर सहमति बनी। 1993 में गठबंधन बना चुके सपा और बसपा के बीच 1995 के बाद से चूहे बिल्ली जैसा वैर है।
लेकिन 1998 में मुलायम और मायावती ने मिलकर कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को गिराकर जगदंबिका पाल को एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बनवाया था। लोकपाल विधेयक पर राज्यसभा में दोनों दलों ने सरकार का विरोध किया। दोनों दल यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन भी दे रहे हैं। मायावती के चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के कुछ महीनों बाद मुख्यमंत्री निवास पर बुलाई गई एक बैठक में खुद मुलायम सिंह यादव शामिल हुए थे और मायावती के साथ उनकी गुफ्तगू हुई थी।
तब से ही सार्वजनिक रूप से दोनों नेताओं ने एक दूसरे पर व्यक्तिगत हमले बंद कर दिए। सपा से अलग हुए अमर सिंह ने कई बार मायावती की तरफ सियासी दोस्ती का हाथ बढ़ाया, लेकिन उन्हें तवज्जो नहीं मिली। अपने करीब साढ़े तीन साल के शासन में न मुलायम ने मायावती के खिलाफ कुछ किया और न ही अपनी पांच साल की सरकार में मायावती ने मुलायम को तंग करने का कोई काम किया। एक दूसरे के प्रति दोनों का रूख नरम करवाने में दोनों के करीबी इस उद्योगपति की खासी भूमिका है।













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