क्‍या हुआ तेरा वादा...ददुआ को मारने वाले इनाम से वंचित

Mayawati
लखनऊ। मायावती सरकार के अफसर जादू जानते हैं और वह भी काला जादू। इन्होंने जिस चीज पर गिली-गिली-छू वाला मंतर मारा फिर उसका पता-ठिकाना न मिला। स्वयं मुख्यमंत्री मायावती को भी उनके खास अधिकारियों के इस हुनर का शायद इल्म न हो। प्रदेश पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) ने लंबे समय से कहर बरपा रहे दुर्दांत डकैत ददुआ को छह साथियों सहित 22 जुलाई 2007 को चित्रकूट के जंगलों में मार गिराया। मायावती की सरकार के गठन के बाद प्रदेश पुलिस की यह पहली महत्वपूर्ण सफलता थी। बड़ी सराहना हुई और मीडिया में भी खूब पब्लिसिटी मिली। घटना की तुलना तमिलनाडु के चन्दन तस्कर वीरप्पन के एनकाउंटर से की जाने लगी।

आखिरकार मायावती का गुंडाराज समाप्त कर अमन स्थापित करने का सपना साकार होता दिख रहा था। पंचम तल पर बैठे खास हुक्मरान मुख्यमंत्री मायावती को प्रसन्न करने के स्वर्णिम अवसर को हाथ से कैसे जाने देते। शुरू हो गया गिली-गिली-छू। तय हुआ कि एक शानदार कार्यक्रम करके एसटीएफ के दल को सम्मानित किया जाए और तमिलनाडु सरकार की तर्ज पर वीरप्पन मामले की तरह खुले हाथों से पुरस्कार बांटे जाएं जिससे कि पूरे देश में मायावती के सुशासन की धाक जम सके। कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह के कक्ष में लंबी वार्ता हुई जिसमें पूर्व प्रमुख सचिव गृह कुंवर फतेह बहादुर, तत्कालीन डीजी पुलिस विक्रम सिंह, मुख्यमंत्री के सचिव शैलेश कृष्ण सहित कई अन्य अधिकारी मौजूद थे।

ददुआ को मारने वाले 20 सदस्यीय दल के जवान, उपनिरीक्षक व निरीक्षकों को आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन के साथ तीन-तीन लाख रुपये और प्रशस्ति पत्र देने की बात तय हुई। साथ ही एक उपनिरीक्षक व दो निरीक्षकों को लखनऊ में जमीन तथा चार वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों शैलजा कांत मिश्र, एके जैन व एसएसपी अमिताभ यश के साथ पीपीएस अधिकारी अनंत देव को एक-एक पिस्टल देना तय हुआ। प्रदेश सरकार के सौ दिन पूरे होने के उपलक्ष्य में गन्ना संस्थान में होने वाले कार्यक्रम में ही 22 अगस्त 2007 को पुलिस दल को भी सम्मानित किया जाना था।

आनन-फानन में चार विदेशी पिस्तौल लखनऊ और कानपुर के शस्त्र विक्रेताओं से खरीदी गईं और पुलिस अधिकारियों के शस्त्र लाइसेंस पर चढ़ा भी दी गईं। चूंकि इतनी जल्दी में नई पिस्तौलों का आयात संभव नहीं था, तो सेकेंड-हैंड पिस्तौल ही खरीदी गईं। पुरानी पिस्तौलों के साथ गन्ना संस्थान में अधिकारियों ने 20 अगस्त को रिहर्सल भी की। यह बात जब कैबिनेट सचिव को पता चली तो फिर से अधिकारियों की मीटिंग बुलाई गई। कैबिनेट सचिव ने डीजी पुलिस को झाड़ लगाई, क्या मुख्यमंत्री सेकेंड-हैंड पिस्तौलें बांटेंगी, तुरंत नई पिस्तौलें आयात की जाएं।

कार्यक्रम 22 अगस्त को होना था तो यह सुझाया गया कि मुख्यमंत्री नए डिब्बों में पुरानी पिस्तौलें अधिकारियों को प्रदान करेंगी जिन्हें बाद में नई बेरेटा पिस्तौलों से बदल दिया जाएगा। इसी कार्यक्रम में ठोकिया डकैत से मुठभेड़ में शहीद छह पुलिस जवानों की विधवाओं को 15-15 लाख रुपये की धनराशि भी प्रदान की जाएगी। कार्यक्रम यथावत संपन्न हुआ। मायावती ने पुरानी पिस्तौलों के साथ प्रशस्ति-पत्र और कुछ चेक वितरित किए। दूसरे ही दिन गिली-गिली-छू वाला मंतर चला और नए डिब्बों में रखी पुरानी पिस्तौलें गायब।

डिब्बों से पिस्तौलें सीधे शस्त्र विक्रेताओं के पास वापस पहुंच गईं। सरकार का पांच साल का कार्यकाल पूरा होने को है, लेकिन कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह और हाल में पदच्युत प्रमुख सचिव गृह कुंवर फतेह बहादुर के बीच नई बेरेटा पिस्तौलें ही नहीं, पुलिस अधिकारियों की जमीनें व मृतक जवानों के 15-15 लाख रुपये ऐसे अटके कि आज तक गिली-गिली-छू हैं।

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