न अन्ना, न भ्रष्टाचार, न कोई विकास की बात, सिर्फ जाति जिन्दाबाद
यूपी चुनाव तो जातिय समीकरणों पर ही केन्द्रित होकर रह गया है। पार्टियां अपने-अपने तरीके से छोटी बड़ी जातियों को आकर्षित करने में जुटी हैं। सपा को पहले लगा कि मुस्लिम वोट के सहारे वह चुनाव जीत सकती है लेकिन चुनाव नजदीक आते ही उसे पिछड़ों व दलितों की भी याद आ गयी।
चुनाव घोषणा पत्र में सपा ने किसानों का पचास हजार तक का कर्ज माफ करने की बात की तो बेरोजगारों को भत्ता देने तक की बात कह दी। कन्याओं के लिए घोषणाएं हुईं तो पिछड़ों के लिए पिटारा खोला गया। भाजपा जो गत एक वर्ष से बसपा के भ्रष्टाचार को उजागर करने में जुटी थी वह अब जातिय समीकरण मिलाने में लगी है। भाजपा मुस्लिम वोटरों को आकर्षित नहीं कर पा रही है कारण कि कांग्रेस द्वारा मुस्लिमों को दिए गए आरक्षण का भाजपा विरोध कर चुकी है ऐसे में उसके पास ऐसा कोई हथियार नहीं है जिसके सहारे व मुसलमानों को अपनी ओर मिला सके।
कांग्रेस भी जातिय समीकरणों में किसी से पीछे नहीं है मुस्लिमों को आरक्षण की बात तो वह पहले ही कर चुकी थी अब वह अति पिछड़ों व अति दलितों का वोट भी अपने पक्ष में करने की जुगत में है जिसके लिए चुनावी सभाओं में घोषणाएं की जा रही हैं। इन सारी चुनावी रणनीतियों में विकास का मुददा गूढ़ हो गया। गांवों से लेकर शहरों तक विकास की बात करने वाला कोई नहीं है।
गांवों में बिजली पानी की समस्या है तो शहरों में गंदगी, यातायात व कई अन्य मूल समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं लेकिन कोई भी राजनीतिक दल इस पर बोलने को तैयार नहीं है। सभी को फिक्र है तो बस जातियों को अपनी ओर करने की ताकि वह किसी प्रकार सत्ता हासिल कर सकें।













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