लोकपाल बिल पर पीएम से मिले सीबीआई प्रमुख

सीबीआई मानना है कि संसदीय समिति के सुझाव मानने की स्थिति में सीबीआई का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा। कार्मिक मंत्रालय को भेजे गए पत्र में सबसे पहली आपत्ति चार्जशीट या क्लोजर रिपोर्ट से पहले लोकपाल की अनुमति लेने की सिफारिश के खिलाफ है। इसे जांच एजेंसी की स्वायत्तता पर कुठाराघात बताया गया है। इसके साथ ही भ्रष्टाचार के सभी मामलों में एफआईआर दर्ज करने के पहले लोकपाल की प्रारंभिक जांच कराने की सिफारिश का विरोध करते हुए सीबीआई निदेशक ने कहा कि इससे भ्रष्ट अधिकारियों को अनुचित लाभ मिलेगा। इसके साथ सीबीआई को अभियोजन शाखा को जांच एजेंसी से अलग कर लोकपाल के दायरे में लाने पर भी आपत्ति है।
सीबीआई निदेशक के पत्र में अभियोजन शाखा को जांच एजेंसी का अभिन्न हिस्सा बताते हुए कहा गया है कि इसके कारण है सीबीआई के 70 फीसदी से अधिक मामलों में आरोपियों को सजा मिल पाता है। जाहिर है इसके अलग होने से सीबीआई किसी दूसरी पुलिस एजेंसी जैसी बनकर रह जाएगी। इसके साथ ही सीबीआई को किसी केस की जांच के लिए छह महीने की समय सीमा तय किए जाने पर भी आपत्ति है। सीबीआई निदेशक ने अपने पत्र में सवाल उठाया है कि आखिर एक जांच एजेंसी की कितनी एजेंसियां निगरानी करेंगी। संसदीय समिति की सिफारिशों के अनुसार लोकपाल बनने के बाद सीबीआई पर लोकपाल और सीवीसी की निगरानी तो होगी ही, साथ ही प्रशासनिक व वित्तीय मामलों में कार्मिक मंत्रालय और कानूनी मामलों में कानून मंत्रालय की निगरानी भी जारी रहेगी।
यही नहीं, चार्जशीट या क्लोजर रिपोर्ट पर सुनवाई के दौरान उसकी जांच अदालतों की निगरानी के दायरे में होता है। वहीं सीबीआई निदेशक की नियुक्ति की पुरानी प्रक्रिया को बरकरार रखने की संसदीय समिति की सिफारिश पर भी जांच एजेंसी को नाराजगी है। उसकी मांग है कि सीबीआई निदेशक का चयन प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और किसी संवैधानिक प्रमुख की समिति द्वारा कराई जानी चाहिए। इस वक्त कार्मिक सचिव, गृह सचिव, मुख्य सतर्कता आयुक्त और कैबिनेट सचिव की समिति सीबीआई निदेशक का चयन करती है।












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