उमर ने घोषणा तो कर दी, पर सच्चाई कुछ और

इसके बाद तो उनका डर ही खत्म हो जाएगा। रक्षा मंत्रालय ने संकेत दे दिया है कि इस पर जवानों की सोच अलग है, लेकिन रक्षा मंत्रालय को समझाने बुझाने की एक और कोशिश को तैयार उमर की मुहिम अब साउथ ब्लॉक की सीढ़ी चढ़ने को तैयार है।
रक्षा सचिव शशिकांत शर्मा, कैबिनेट सचिव अजित सेठ और गृह सचिव राजकुमार सिंह इस बेहद संवेदनशील मामले पर विशेष चर्चा कर सकते हैं। एनडीसी की बैठक के सिलसिले में उमर अभी दिल्ली में ही हैं। उधर सूबे में सियासी रंग ले रहे इस अभियान को मुकाम तक पहुंचाने के दबाव में आ चुके अब्दुल्ला भी एएफएसपीए में नरमी का कोई फैसला करा लेना चाहते हैं।
श्रीनगर से नई दिल्ली पहुंची इस मुहिम की विफलता की बाट जोह रहे विपक्ष को एक और सियासी मिसाइल मिलने की आशंका से परेशान मुख्यमंत्री उमर ने अब कोशिशें और तेज की हैं। विशेष सशस्त्र बल से कुछ हिस्सों को निजात दिलाने की सियासत में पड़ चुके उमर की दोहरी राजनीतिक रणनीति है। पहला उमर इस मुहिम को कामयाबी के शिखर तक ले जाकर सूबे की जनता की वाहवाही लूटना चाहते हैं। दूसरा, विफलता हाथ लगने पर पर कहीं न कहीं इसे केंद्र के पाले में डालकर इससे पीछा छुड़ाकर आवाम के कठघरे में दिल्ली में बैठी सरकार को खड़ा कर देना चाहते हैं।
कश्मीर के वार्ताकारों की रिपोर्ट में एएफएसपीए हटाने की सिफारिश को आधार बनाकर उमर ने गृहमंत्रालय पर दबाव भी बनाया हुआ है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात के हर मौके का फायदा उमर इसी मकसद से उठाना भी चाहते हैं। बीते दिनों में उमर ने दिल्ली के कई दौरे किए हैं। इस दौरान प्रधानमंत्री और चिदंबरम से मुलाकातें भी खूब हुई हैं।
उनकी सियासत को खूब समझ रहे दोनों नेताओं की भी यही रणनीति समझ में आ रही है कि अगर फौजी कानून में कटौती होती भी है तो इसका श्रेय कांग्रेस और केंद्र की सरकार को जाए। लेकिन यूपीए सरकार डर रही है कि फौज के अधिकार कम करने का बुरा प्रभाव पड़ेगा। एक तरफ फौज में नाराजगी बढ़ेगी दूसरी ओर भाजपा की स्थिति मजबूत होगी।












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