अमेरिका का हमसफर पाक चीन का साथ पाकर रुसवाई की ओर

जब से पाकिस्तान आतंकवाद मामले में अमेरिका का सहयोग कर रहा था तब से अमेरिका को उसकी नीयत पर शक था। आतंकवाद मामले पर अमेरिका को सहयोग करने का दिखावा करने वाला पाकिस्तान दरअसल आतंकवाद को समर्थन दे रहा था। आतंकी ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान के पाए जाने के साथ ही इस बात की पुष्टि भी हो गई। ओसामा की मौत के साथ ही अमेरिका का मिशन अफगानिस्तान भी अपने अंतिम पड़ाव में पहुंच गया। अब अमेरिका ने नाटो व अपनी सेनाओं को अफगानिस्तान से धीरे-धीरे वापस निकालने का फैसला लिया है।
अमेरिका को पता है कि अब उसे पाकिस्तान के साथ की उतनी दरकार नहीं थी जितनी ओसामा की मौत से पहले थी। जिस वजह से उसने पाकिस्तान पर अपना शिकंजा कसना शुरू कर दिया। बराक ओबामा ने पाकिस्तान को कभी भी उतनी तवज्जो नहीं दी जितनी जार्ज डब्लू बुश दिया करते थे। हाल ही में अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में अमेरिकी दूतावास को निशाना बनाकर किए गए हमले के पीछे भी अमेरिका ने पाकिस्तान की खूफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ होने की बात कही थी।
अपने पर लगे इन आरोपों से पाकिस्तान बुरी तरह तिलमिला गया। पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी ने अमेरिका को चेतावनी दे डाली कि अगर अमेरिका ने पाकिस्तान पर आरोपों का सिलसिला बंद नहीं किया तो वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अपना एक अहम सहयोगी खो देगा। अमेरिका का कहना है कि इस हमले के पीछे हक्कानी ग्रुप का हाथ है जिसे पाक शह दे रहा है। जहां अमेरिका एक तरफ पाकिस्तान को आतंकवाद से दूर रहने की चेतावनी दे रहा था वहीं चीन इस मौके को भुनाने में लगा था। चीन ने इस मौके पर पाकिस्तान को हर तरह की मदद मुहैया कराने का आश्वासन दे दिया। चीन अगर अपनी इस नीति में कामयाब हो जाता है तो अमेरिका को आतंकवाद के खिलाफ मिलने वाला सहयोग बंद हो जाएगा वहीं चीन पाकिस्तान की सीमाओं का इस्तेमाल भारत के खिलाफ कर सकता है।












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