नवरात्रि तीसरा दिन- मां चंद्रघंटा की करें स्तुति

Maa Kushmanda
कूष्माडा मां का चौथा स्वरूप है। मां का यह दिव्य स्वरूप हमारे भतीर के रोग, तमस, शोक, विकास, अज्ञान, आलस्य व दुर्भावना आदि को दूर करता है। आज के दिन मां कूष्माडा की आराधना भक्तों को जड़ से चेतन की ओर ले जाती है व्यक्ति को यश, बल, बुद्धि प्रदान करती है। मां सिंह पर सवार अष्टभुजाधारी, मस्तक पर रत्नजडि़त स्वर्ण जडि़त मुकुट पहने अपने भक्तों को आर्शीवाद देने प्रकट होती है। आज के दिन मां के कूष्माडा रूप की स्तुति ही भक्तों को ढेरों कष्टों से मुक्त कराती है। मां के इस रूप पर कुम्हड़े (कद्दू) की बलि देनी की परम्परा है जिससे व्यक्ति के भीतर बसे हिंसक जीवन का नाश होता है।

तृतीया तिथि की हानि के कारण मां के तीसरे रूप चन्द्रघंटा को लेकर कई ब्राह्मणों में विवाद रहा। कुछ विद्वानों ने द्वितीय व तृतीय तिथि को एक साथ कहा तो कइयों ने तृतीय व चतुर्थ रूप की एक ही दिन आराधना की स्वीकृति दी। फिलहाल भक्त आज मां कूष्मांडा की स्तुति करेंगे। मां के इस रूप का ध्यान जीवन के विकास में बाधक कुसंस्कारों को परास्त करते हुए सत्यप्रवृतियों के विकास और आत्मसुधार में प्रवृत्त करना है।

अपने सदगुणों में वृद्धि करते हुए हम यश व आरोग्य की प्राप्ति करते हुए अपने जीवन पथ पर आगे बढ़ सकते हैं। भक्त अपनी मां की आराधना कर कठिन लक्ष्य को आसानी से प्राप्त कर सकता है। मां का आर्शीवाद रहे तो संसार की कोई भी विभूति भक्त के लिए अप्राप्य नहीं रह सकती। हमें अपनी मानसिक प्रवृत्तियों को उच्च मार्ग की ओर ले जाने का प्रयास करना चाहिए तथा कुत्सित मानसिकता का त्याग करना चाहिए।

निरंतर स्वध्याय के द्वारा हम आत्मशुद्धि व आत्मनिर्माण कर सकते हैं। मां शक्ति दुर्गा के चौथे स्वरूप का नाम हैं मां कूष्मांडा। अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्माण्ड को उत्पन करने के कारण मां के इस रूप के नाम कूष्मांडा पड़ा। पौराणिक कथाओं में कहा जाता है कि जब दुनिया नहीं थी चारों ओर सिर्फ अंधकार था उस वक्त मां अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की उत्पत्ति की थी। मां सूरज के घेरे के भीतर रहती हैं। इन्हीं के तेज प्रकाश से दसों दिशाएं प्रकाशित होती हैं। मां के इस रूप में इतनी शक्ति है कि वह सूरज की तपिश को भी सहन कर सकती है इसीलिए इन्हें शक्ति का रूप कहा जाता है तथा इस रूप की आराधना करने से व्यक्ति के भीतर शक्ति का संचार होता है। सिंह पर सवार दैदीप्यमान देवी को कुम्हड़े (कद्दू) की बलि देने की परम्परा है जिस कारण इन्हें कूष्मांडा कहा जाता है।

ध्यान मंत्र

सुरांसपूर्ण कलशं रूधिराप्लुतमेय च।
दधानांहस्तपद्याभ्यां कूष्मांडा शुभदास्तु में।।

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