अन्‍ना के आंदोलन पर भारत के युवा की आवाज़

आज 16 अगस्त है, हालाँकि ना तो आज कोई भारतीय त्यौहार है ना ही कोई सरकारी छुट्टी। सब लोगो के दफ्तर, कॉलेज, स्कूल खुले हैं, पर आज की यह 16 अगस्त कुछ अलग है दोस्तों...

अगर कोई मुझसे पूछे तो आज का दिन मेरे लियें किसी भी राष्ट्रीय पर्व या भारतीय त्यौहार से बढकर है और यकीन मानिये यह सिर्फ शब्द नहीं है। आज जो भी मैं लिख राह हूँ वो शायद मेरे अंदर कहीं न कहीं छुपे एक सच्चे भारतीय के जज्बात हैं। हाँ तो ज़रा जान ले की क्यों 16 अगस्त इतना महत्वपूर्ण है।

आज एक 74 साल का बूडा व्यक्ति हम सब को एक ऐसी क्रांति का एहसास करा रहा है, जो शायद हम बहुत सालो तक याद रखेंगे। कहते हैं 1964 की पाकिस्तान के साथ जंग में अन्ना अपनी बटालियन में अकेले जिन्दा लौटे थे, अन्ना को एक गोली बस छूते-छूते निकल गयी थी। हालाँकि फौजी तो हमारे देश में रोज मरते रहते हैं किसे फर्क पड़ता है, सरकार तो उन्हें कब का भुला चुकी है।

रही बात हमारी, तो हम लोग तो राखी सावंत की बयानबाजी या फिर क्रिकेट के मैच को देखने में ही इतने मशगूल हैं, की अब इन छोटी छोटी चीजों का कहाँ ध्यान रखेंगे। पर बात हो रही है की आखिर अन्ना ही बचके क्यों लौटे। मेरा मानना है की अन्ना को ऊपर वाले ने शायद इसलिए बचा लिया था, क्‍योंकि वो कही ना कही जानता था, कि यही आदमी भारत के लिए बहुत कुछ करेगा। ईश्‍वर को आगे आने वाले भ्रष्‍टाचार का अंदेशा था, इसीलिए अन्‍ना को बचा लिया।

दोस्तों मैंने आजादी की लडाई नहीं देखी, पर सोचता हूँ तो लगता हैं कुछ ऐसा ही माहौल रहा होगा उस वक़्त भी। तब भी कुछ गोरे हुक्मरान यू ही भारतीयों को जुलूस निकालने से, एक जगह एकत्रित होने से डराते होंगे। तब भी यू हीं गाँधी को डराया जाता होगा की कल आप फलाना जगह शांति से प्रदर्शन नहीं कर सकते या कल आप जुलूस नहीं निकालेंगे। ऐसा ही कुछ कहकर हमारी सरकार भी अन्ना को धमका रही है।

हो भी सकता है यह केवल धमकी ना हो कल शायद गोली चले, शायद लाठी पर ना उस वक़्त गाँधी डरा था ना इस वक़्त अन्ना डरेगा। हमेशा दोस्तों क्रांति उठती ऐसे ही है, एक चिंगारी से। पर अगर चिंगारी को भी हवा ना मिले तो वोह आग के रूप में फैल नहीं पाती और बस दबकर रह जाती है। अन्ना, गाँधी यह सब चिंगारी और हम यानी आम आदमी वो हवा जो इनके मकसद को चाहे तो एक दावानल बना दे या एक ऐसी फुस्स सी चिंगारी जिसको कोई भी पैर रख के मसल देगा।

यूँ तो दिल्‍ली में अन्‍ना को गिरफ्तार किया जा चुका है। और हम और आप शायद टीवी पर उन्हें देख के पूरे दिन चर्चाएं भी कर रहे हैं। पूरा भारत अपने-अपने हिसाब से परिस्थितयों का आंकलन कर रहे हैं।

पर इतना सा उस वक़्त याद कर लीजियेगा की जाह आप अपने ए.सी कमरों में बेठे चर्चाएं कर रहे है वही एक शरीर से बूड़ा, पर मन से आप और मुझ से शायद कही जवान अकेला आप और मुझ जैसे लोगो के लिए जिन्होंने कभी ना कभी अपनी जिंदगी में भ्रस्ताचार सहा होगा, के लिए दिली में सारी भारत सरकार से पंगा लेने के इरादे से बैठा हैं।

ज़रा सोचिए भारत सरकार, वही भारत सरकार जिसके एक छोटे से सरकारी बाबू से हम उलझने से पहले 10 बार सोचते है। मुझे नहीं पता कितने लोग मेरे इस लेख को पड़ेंगे और कितने इसे एक बकवास समझ के आगे बड़ जायेंगे, पर जो पड़े उनसे मेरी एक ही प्रार्थना है की इस बार इस आंधी को ना थमने देना अगर निकलना पड़े तो निकलना अपने अपने घरो से, गलियों में, चौराहों पे। दिखाना होगा इस सरकार को अब यह चिंगारी आग बनके ही रहेगी।

मैं समझ सकता हूँ की हम आम आदमी से ज्यादा मजबूर शायद ही कोई होगा, हमारे हाथ किसी ना कारण से बंधे रहते है। पर दोस्तों बचपन की उस कहानी को याद करीयें जिस में सिखाया गया था की अगर पतली पतली लकड़ियाँ जिन्हें शायद अकेले कोई भी तोड़ सकता है। अगर मिल के एक गट्ठर बना ले तो अच्छे-अच्छे सूरमाँ फिर उसे नहीं तोड़ पाते।

इसलियें अंत में यही गुजारिश हैं की क्रांति की इस हवा को ना रुकने देना और उस भरष्टाचार मुक्त भारत का सपना जो शायद गाँधी ने कभी देखा था उसे इस बार हर हालत में हकीकत बनाने के लिए जी जान लगा देना। जय हिंद!!

लेखक परिचय- निशांत हिरानी, इलाहाबाद स्थित आईआईआईटी में बीटेक के छात्र हैं।

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