बूटा कह रहे थे हाथ, इंदिरा समझ रही थी हाथी

चुनाव आयोग ने गाय-बछड़ा चुनाव चिह्न ज ब्त कर लिया था। इंदिरा कांग्रेस के लिए नए चुनाव चिह्न की जरूरत थी। इंदिरा गांधी ने बूटा सिंह को इसकी जिम्मेदारी दी थी। चुनाव आयोग ने तीन विकल्प दिए थे। हाथ (पंजा), साइकिल और हाथी।
बूटा सिंह ने अपने खास पंजाबी अंदाज में फोन पर इंदिरा गांधी से कहा कि या हम हाथ चुनाव चिह्न ले लें। इंदिरा गांधी उस समय नरसिंह राव के साथ विजयवाड़ा में थीं। इंदिरा गांधी को लगा कि बूटा सिंह हाथी कह रहे हैं। उन्होंने मना कर दिया। बूटा सिंह 15 मिनट तक पंजाबी से लिपटी हिंदी में बताते रहे कि हाथ। इंदिरा गांधी को बार-बार यही लगता था कि वह हाथी कह रहे हैं। आखिर में परेशान हो कर इंदिरा गांधी ने फोन नरसिंह राव को दे दिया। कहा आप ही सुन कर बताएं बूटा सिंह या कह रहे हैं। बूटा सिंह से बात करने के बाद कई भाषाओं के जानकार नरसिंह राव समझ गए कि हाथ से उनका मतलब पंजा है। उन्होंने बूटा सिंह से कहा, आप पंजा कहिए। फिर इंदिरा गांधी से उनकी बात हुई और पंजा के निशान पर इंदिरा गांधी की आखिरी मुहर लगी।
राशिद किदवई की नई किताब 24 अकबर रोड में इसका खुलासा किया गया है। हालांकि कुछ कांग्रेसी नेताओं ने यह कहते हुए इस चिह्न का विरोध किया था कि इससे ट्रेफिक सिग्नल का आभास होता है। इस किताब में एक ऐसी घटना का जिक्र किया गया है जिससे लगता है वाकई हास्य अभिनेता मेहमूद अपनी दुनिया में ही खोए रहते थे। एक बार अमिताभ बच्चन मेहमूद के भाई अनवर और राजीव गांधी के साथ मेहमूद के पास गए। मेहमूद रोज नींद की गोलियां लेते थे। जब अमिताभ पहुंचे उस समय तक मेहमूद गोली ले चुके थे। बातचीत शुरू ही हुई थी कि मेहमूद ने पांच हजार रुपये निकाले और अपने भाई अनवर को दे दिए। कहा, इसे अमिताभ के दोस्त (राजीव गांधी) को दे दो। यह बड़ा स्मार्ट है। यह मेरी अगली फिल्म के लिए पेशगी है। अनवर समझ गए मेहमूद पर गोलियों का असर हो चुका है । उन्होंने फिर परिचय कराया यह इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी हैं। उसके बाद चुपचाप मेहमूद ने पैसे वापस ले लिए। इस पर राजीव गांधी और अमिताभ दोनों हंस पड़े।
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