मुंबई धमाकों पर राहुल गांधी का बयान एक कड़वा सच
दिग्विजय सिंह ने अपनी बात कहते हुए तमाम राजनीतिक तर्क दिये, लेकिन अगर इस बात की गहरायी में जायें तो सही मायने में राहुल गांधी ने वो सच कहा है जो कड़वा लगता है। राहुल के इस बयान के बारे में चर्चा करने से पहले हम 10वीं कक्षा पास करने वाले एक आम छात्र की जिंदगी में झांकते हैं। जब एक छात्र 10वीं पास करता है तो उसके माता-पिता, टीचर और तमाम लोग उससे यही कहते हैं कि आगे के क्षेत्रों का चुनाव करने से पहले वो खुद का आंकलन करे। यह देखे कि उसका बौद्धिक स्तर क्या है उसके बाद ही आगे कदम बढ़ाये। सच पूछिए तो इन सभी की बातें सौ फीसरी सही हैं और कारगर भी। इंसान को अपना स्तर और अपनी क्षमता पता होनी चाहिये।
अब बात अगर देश के खुफिया तंत्र की करें तो शायद राहुल गांधी अपनी इस व्यवस्था का आंकलन कर चुके हैं। इसी लिए उन्होंने यह बात कही। उन्होंने कहा, "अफगानिस्तान और इराक में रोज ऐसे ब्लास्ट होते हैं..." इसके आगे और पीछे के शब्दों को जोड़ कर हम यही बात फिर लिखते हैं। "9/11 के बाद अमेरिका में एक भी हमला नहीं हुआ। हम अपनी तुलना अमेरिका से नहीं कर सकते, लेकिन इराक और अफगानिस्तान में ऐसे धमाके रोज होते हैं, वहां अमेरिका क्यों नहीं हमलों को रोक पाता।" यहां राहुल गांधी ने यह भी जता दिया कि अमेरिका का खुफिया तंत्र हमसे मजबूत है, लेकिन इतना मजबूत भी नहीं जितना हम उन्हें समझते हैं।
सभी के लिए राहुल गांधी को गरियाना तो आसान था, लेकिन क्या किसी राजनेता ने खुफिया तंत्र को और मजबूत बनाने के लिए कोई सुझाव दिया? क्या किसी नेता ने देश की सुरक्षा पर चर्चा करने के लिए सर्वदलीय बैठक कराने का प्रस्ताव रखा? नहीं क्योंकि देश के नेताओं को किसी समस्या को सुलझाने के बजाये उसे बनाये रखने में ज्यादा मजा आता है, क्योंकि जब तक समस्या रहेगी तब तक उनकी राजनीति चमकती रहेगी। पढ़ें- देश दुनिया की बड़ी खबरें।
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