उत्तर प्रदेश में सभा, जुलूस करना मुश्किल

उत्तर प्रदेश में सभा, जुलूस करना मुश्किल
रामदत्त त्रिपाठी

बीबीसी संवाददाता, लखनऊ

अपने कई आदेशों के चलते उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती पहले भी विवादों में रही हैं. उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार ने आदेश जारी किया है कि प्रदेश में सभा, जुलूस या प्रदर्शन के आयोजन से पहले लिखित अनुमति लेनी ज़रूरी होगी. प्रशासन की ओर से जारी हुक्म में कहा गया है कि हर ज़िले या तहसील में प्रशासन द्वारा निर्धारित स्थान पर ही धरना, प्रदर्शन की अनुमति दी जाएगी.

साथ ही ऐसे किसी भी कार्यक्रम के पहले आयोजकों को कम से कम एक सप्ताह पहले अनुमति के लिए निर्धारित फ़ार्म पर प्रार्थना पत्र देना होगा. उन्हें ये कार्यक्रम अधिकारियों से सलाह करके ही करने होंगे. आयोजकों को एक फ़ार्म पर वचन-पत्र भरकर ये आश्वासन भी देना होगा कि सभा, जुलुस या प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को कोई क्षति नहीं होगी और अगर ऐसा हुआ तो वो उस क्षति के लिए ज़िम्मेदार होंगे और उसकी भरपाई करेंगे. आदेश का ठीक से पालन न होने पर अधिकारियों को भी कठोर दंड दिया जाएगा.

फ़ौरन लागू

कानून के जानकार इस आदेश को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बता रहे हैं. समझा जाता है कि इस आदेश का असर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मुहिम चला रहे अन्ना हज़ारे की उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित रैलियों पर भी पड़ सकता है.

प्रमुख गृह सचिव कुंवर फ़तेह बहादुर ने लखनऊ में एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा, "राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था तथा शिष्टाचार एवं सदाचार के हितों को ध्यान में रखते हुए तथा समाज में साम्प्रदायिक एवं जातिगत सौहार्द बनाए रखने के उद्देश्य से धरना प्रदर्शन के आयोजकों को जिला प्रशासन के सक्षम स्तर से पूर्व अनुमति प्राप्त करनी होगी."

कुंवर फ़तेह बहादुर का कहना है कि यह आदेश सर्वोच्च और उच्च न्यायालय के आदेशों को ध्यान में रखकर जारी किया गया है. लेकिन जानकार कहते हैं कि अदालतों के आदेश आंदोलनों के दौरान यातायात में रुकावट और सार्वजनिक संपत्ति की क्षति के सम्बन्ध में हैं न कि सभा, जुलूस, धरना अथवा प्रदर्शन के लिए सरकार की अनुमति अनिवार्य करने के संबंध में.

प्रेस कांफ्रेंस में प्रमुख गृह सचिव इस बात का उत्तर नही दे सके कि ये आदेश किस कानून या अधिनियम के तहत जारी किये गए हैं. एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि यह आदेश बुधवार के बाद आयोजित किए जानेवाले सभी कार्यक्रमों पर लागू होगें जिसमें अन्ना हज़ाके कि रैलियाँ शामिल हैं. चुनाव करीब होने के के कारण इस समय सभी राजनीतिक पार्टियाँ बड़े पैमाने पर धरना प्रर्दशन और रैलियाँ आयोजित करने की तैयारी मे लगी हैं.

प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह आगामी 30 अप्रैल को बांदा में पार्टी महासचिव राहुल गाँधी के साथ एक रैली को संबोधित करने वाले हैं.

गैरक़ानूनी

हाईकोर्ट के सीनियर वकील आई बी सिंह के मुताबिक़, "यह आदेश संविधान में दिए गए सभा जुलूस और अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है." आई बी सिंह का कहना है कि जिला मजिस्ट्रेट केवल शांति भंग होने की आशंका में एक निश्चित इलाके में कुछ समय के लिए ही सभा जुलूस या प्रदर्शन की पूर्व अनुमति लेने का आदेश कर सकते हैं.

उनका कहना है कि इस तरह का आदेश पूरे प्रदेश में अनिश्चितकाल के लिए लागू करना इमरजेंसी लागू करने जैसा है. भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता हृदय नारायण दीक्षित ने इस आदेश को पूरी तरह 'तानाशाही भरा कदम" बताया है. दीक्षित का कहना है कि सरकार पूरे प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की आयोजित रैलियों में आने वाली भारी भीड़ से बौखला गई है इसीलिए इस तरह का असंवैधानिक आदेश लागू किया गया है. उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री मायावती जिस तरह अपनी पार्टी और मंत्रिमंडल में अलोकतांत्रिक रूप से कार्य कराती हैं वह पूरे प्रदेश को उसी तर्ज़ पर चलाना चाहती हैं.

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