'मौनी बाबा' के खामोशी आंदोलन के 23 बरस पूरे

मुजफ्फरनगर, 1 फरवरी (आईएएनएस)। एक व्यक्ति अपनी जिंदगी के पूरे 23 साल अपने खामोशी आंदोलन को समर्पित कर चुका है। मौनी बाबा के नाम से मशहूर यह व्यक्ति विश्व शांति के लिए अपनी जुबान पर ताला लगाए हुए है।

मौनी बाबा अपना इतिहास भूल चुका है और मरते दम तक मौन साधना के सहारे जीना चाहता है। जुबान खोलने की खुद की बंदिशों को अपनी दिनचर्या में समेटे यह व्यक्ति गले में तख्ती टांग शहर की गलियों में शांति का प्रचार करता फिर रहा है। बस, कागज-कलम के सहारे ही उससे संवाद स्थापित किया जा सकता है।

सड़कों पर चलते लोग हालांकि उस शख्स को विक्षिप्त समझते हैं, लेकिन मौन रहना अब उसके जीवन का हिस्सा है। बघरा क्षेत्र के जागाहेड़ी गांव का यह मौनी बाबा डा़ मलिक के नाम से जाना जाता है। इस व्यक्ति ने 1987 से ही अपनी जुबान से एक भी शब्द न बोलने की कसम क्या ली, आज इस व्रत को 23 साल पूरे हो गए हैं। वह लिखकर ही बताता है कि वह शांति के प्रचार के लिए ऐसा करता है।

वह प्रतिदिन गांव से शहर आकर गले में शांति के प्रचार की तख्ती टांगकर शहर के व्यस्त क्षेत्रों में घूमता रहता है। कोई उसके अंदर के मर्म को नहीं जान पाया है। वह केवल कागज-कलम के सहारे चंद बातें करता है। अपना सही नाम बताने के स्थान पर वह केवल मौनी बाबा लिखकर अपनी कलम को ठहरा देता है। घर और गांव के बारे में पूछे गए सवालों को वह टाल देता है। साथ ही विश्व शांति को अपना मिशन बताता है।

मौनी बाबा अपने पुराने दिनों को याद नहीं करना चाहता। उसे अपने पुराने नाम की शायद अब आवश्यकता भी नहीं है। उसके गांव के निवासी हालांकि उसे विक्षिप्त बताते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि उसने 23 साल पहले अपने परिवारिक व वैवाहिक जीवन के कुछ कड़वे अनुभवों के बाद मौन व्रत रख लिया था, उसके बाद फिर उसे किसी ने बोलते नहीं सुना।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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