'पांडवों के वंशज' जौनसार-बाबर पर होगा शोध
इन लोगों के बीच किस तरह का नेतृत्व काम करता है, इस पर भी समाजशास्त्री एक नई खोज करेंगे।
देहरादून के चकराता तहसील के अंतर्गत निवास कर रही जौनसार-बाबर जनजाति अपनी अनोखी संस्कृति व विवाह नियमों को लेकर विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। उत्तराखण्ड के अलग प्रदेश बनने के बाद भी इस क्षेत्र का अधिक विकास नहीं हो पाया। यह जनजाति कैप्यूनी, कालसी और चकराता तहसील के 358 राजस्व गांव वाले 1002़.07 वर्ग किलोमीटर में हिमाचल की सीमा तक फैला हुई है। यह पूरा क्षेत्र 39 खत्तों में विभक्त है।
जौनसारी स्वयं को पांडवों का वंशज मानते हैं। यहां इनको पूजा जाता है। इस जनजाति में बहुपति विवाह प्रथा प्रचलित है। यहां की महिलाएं अपने परम्परागत साज-श्रृंगार व पहनावे में रहती हैं। नई पीढ़ी हालांकि अब अपने विकास की ओर अग्रसर हो रही हैं। देश के समाज शास्त्रियों के लिए भी यह क्षेत्र आकर्षण का केंद्र रहा है।
खतौली कस्बे के के.के. जैन डिग्री कॉलेज के सहायक प्रोफेसर व समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष जितेंद्र कुमार ने इस जनजाति पर एक नए अध्ययन की पहल की है। उनके 'इमरजिंग पैटर्न ऑफ ड्राइबल लीडरशिप : ए सोशियलजिकल स्टडी इन जौनसार बाबर एरिया के अंतर्राष्ट्रीय मानकों पर तैयार रिसर्च डिजाइन को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने मंजूरी देकर प्रोजेक्ट के लिए चार लाख 81 हजार दो सौ रुपये स्वीकृत किए हैं।
कुमार ने बताया कि चकराता व कालसी ब्लॉक चकराता तहसील के ब्लॉक हैं जो हिमाचल प्रदेश की सीमा तक फैला हुआ है। उनका मानना है कि यह अध्ययन जौनसार-बाबर समाज को नई दिशा देने में सहयोग करेगा और इससे कई योजनाएं बनाने में सहायता मिलेंगी।
के.के. जैन डिग्री कॉलेज के प्राचार्य डा़ डी़.के. शर्मा ने बताया कि इस विषय पर प्रोजेक्ट को यूजीसी से स्वीकृति मिलना बड़ी सफलता है। उन्होंने बताया कि अनुसूचित जनजाति के क्षेत्र पर अध्ययन के लिए जौनसार-बाबर क्षेत्र में एक अध्ययन केंद्र स्थापित कर समन्वयक व सहयोगियों को प्रशिक्षण देकर उन्हें नियुक्त किया जाएगा।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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