बिहार में 'विधायक फंड' समाप्त

बिहार में 'विधायक फंड' समाप्त

मणिकांत ठाकुर

बीबीसी संवाददाता, पटना बिहार सरकार के इस फ़ैसले से सत्ता पक्ष के भी कई विधायक नाराज़ बताए जा रहे हैंबिहार सरकार ने विधायकों को उनके क्षेत्र के विकास के लिए दिए जाने वाले एक करोड़ रुपए के 'विधायक फ़ंड' को समाप्त करने का फ़ैसला किया है.बिहार मंत्रिपरिषद ने 318 करोड़ रुपए की योजना को समाप्त करने की मंज़ूरी दे दी है.लेकिन इस फ़ैसले को तत्काल प्रभाव से लागू करने के बजाय अगले वित्तीय वर्ष यानी 2011 - 2012 से लागू किया जाएगा.

'विधायक फ़ंड' की राशि के दुरुपयोग की बात बहुत समय से उठाई जाती रही है.अपनी दूसरी पारी में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि उनकी सरकार भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए क़दम उठाएगी.'विधायक फ़ंड' को ख़त्म करना इसी पहल का हिस्सा माना जा रहा है.नीतीश कुमार ने कहा है कि वे बिहार को भ्रष्टाचार से मुक्त कराएँगेराज्य की विधानसभा में 243 और विधान परिषद में 75 सदस्य हैं. इस तरह बिहार में कुल मिलाकर 318 विधायक हैं.

सभी 318 विधायकों को पिछले 30 सालों से अपने क्षेत्र में स्वेच्छा से चुनी गई विकास योजनाओं पर प्रति वर्ष एक करोड़ रूपए तक ख़र्च करने का अधिकार मिला हुआ है. ससंद सदस्यों को विकास निधि की सुविधा मिली हुई है और कई अन्य राज्यों में विधायकों को विकास निधि की सुविधा विधायकों को मिली हुई है. लेकिन बिहार सरकार ने 'विकास योजना निधि' को ख़त्म करके विधायकों की अनुशंसा पर यहाँ कोई पारदर्शी वैकल्पिक व्यवस्था लागू किए जाने का निर्णय लिया है.

इस वैकल्पिक योजना के विवरण अभी नहीं दिए गए हैं क्योंकि इसे ख़त्म करने के फ़ैसले के साथ ही निर्देश दिए गए हैं कि राज्य सरकार का योजना और विकास विभाग इस बाबत कोई वैकल्पिक व्यवस्था का प्रस्ताव तैयार करे.यह पुराना आरोप है कि इस 'फ़ंड' का अधिकांश हिस्सा कमीशन के रुप में बँट जाता है.

जानकार लोग कहते हैं कि कुछ अपवाद को छोड़ बाक़ी सभी विधायक कथित विकास के कार्य स्वीकृत करने के बाद इस कुल स्वीकृत योजना राशि का 20-25 प्रतिशत बतौर कमीशन लेते रहे हैं. इसके अलावा 20-25 फ़ीसदी राशि इंजीनियर-अधिकारियों में और इतनी ही राशि ठेकेदारों में बँटती रही है.

इस तरह संबंधित योजना पर आवंटित राशि में से मात्र 20-25 प्रतिशत ही सही मायने में खर्च की जाती है. कहा जा रहा है कि 'विधायक फ़ंड' में ऐसी लूट या भ्रष्टाचार की आम शिकायतों के बाद और इस झंझट में नहीं पड़ने वाले कुछ साफ़-सुथरी छवि वाले विधायकों की सलाह पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसे बंद करने का निर्णय लिया है.

पहले कहा जा रहा था कि पहले इस 'फ़ंड' को तुरंत ख़त्म किया जाना था लेकिन उसे कई कारणों से टाल दिया गया.इस फ़ैसले को तुरंत लागू न करने के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं लेकिन मुख्य वजह बताई जा रही है कि इससे सत्ता पक्ष के भी कई विधायक नाराज़ हैं.बताया गया है कि मंत्रिमंडल की बैठक में सिर्फ़ इतनी चर्चा हुई कि 'विधायक फ़ंड' को तत्काल प्रभाव से ख़त्म न करके, अगले वर्ष पहली अप्रैल से समाप्त किया जाए.

कहा जा रहा है कि सालाना 20-25 लाख रूपए तक की कमाई और क्षेत्र में अपने समर्थकों को इस फ़ंड का लाभ देकर खुश रखने की गुंजाइश ख़त्म हो जाना कई विधायकों को आसानी से मंज़ूर नहीं हो रहा है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने अब चुनौती भ्रष्टाचार की आशंका से रहित कोई ऐसी योजना बनाने की है, जो नेता-अफ़सर-ठेकेदार के गिरोह के निहित स्वार्थ से परे हो. इसलिए नीतीश कुमार ने कहा है, "सभी विधायकों से अपील है कि वो इस फ़ंड के कारण बिगड़ रही अपनी छवि और राजनीति की गिरती जा रही साख को बचाने के लिए साहस के साथ आगे आएं." उधर बहुत-से विधायकों के बीच इस मामले पर कानाफ़ूसी भी शुरू हो गई है .

दबी ज़बान से वो कहने लगे हैं कि 'मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चुनाव में भारी सफलता के अति उत्साह में व्यक्तिगत -छवि चमकाओ मुहिम के आगे विधायकों को बेअसर और नौकरशाहों को असरदार बनाने पर तुले हैं.' वैसे आम तौर पर विधायक निधि को समाप्त किए जाने के सरकारी फ़ैसले का स्वागत हो रहा है.

इसे ऐतिहासिक निर्णय बताते हुए उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा, "अब केंद्र सरकार को भी चाहिए कि भ्रष्टाचार से लांछित हो रहे प्रति सांसद सालाना दो करोड़ रूपए वाले 'सांसद फ़ंड' को भी समाप्त कर दे, ताकि लोगों के बीच राजनीति से जुड़े जन-प्रतिनिधियों की छवि सुधर सके."एक ओर जब 'सांसद निधि' को सालाना प्रति सांसद दो करोड़ रूपए से बढ़ाकर पाँच करोड़ रूपए कर देना ज़रूरी बताया गया है, तब सुशील मोदी के इस सुझाव का असर देखना दिलचस्प होगा.

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