नोटिस बोर्ड पर चिस्पा रह जाती हैं 'एंटी-रैगिंग गाइडलाइंस'!

फिर चाहे हॉस्टल हो या फिर कॉलेज परिसर एक बार एंटी-रैगिंग गाइडलाइंस चस्पा कर, सभी शांत बैठ जाते हैं। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और मध्य प्रदेश में हजारों कॉलेजों में आज भी गाइडलाइंस चस्पा नहीं की गई हैं। इनमें से अधिकांश कॉलेज सामान्य स्नातक, परास्नातक पाठ्यक्रम चलाते हैं। जबकि केंद्र सरकार के नियमों के मुताबिक नोटिस बोर्ड के साथ-साथ कॉलेज के प्रॉसपेक्टस में एंटी-रैगिंग गाइडलाइंस होना आवश्यक है।
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लखनऊ के समाजशास्त्री डा. डी त्रिपाठी का कहना है कि असल में 60 फीसदी से अधिक शिक्षण संस्थाओं के अधिकारियों में यह धारणा है कि सिर्फ इंजीनियरिंग व मेडिकल कॉलेज में ही रैगिंग होती है। यही कारण है कि बीए, बीएससी, बीकॉम, एमए, एमएससी, एमकॉम चलाने वाले कॉलेजों में एंटी-रैगिंग गाइडलाइंस नहीं देखने को मिलतीं, जबकि सही मायने में रैगिंग का कोर्स से कोई लेना देना नहीं है।
कुल मिलाकर रैगिंग को रोकने के लिए प्रत्येक छात्र को जागरूक करना होगा, उसके लिए प्रॉसपेक्टस में ही नहीं, संस्थान के हर विभाग व छात्रावासों के नोटिस बोर्ड पर होना चाहिए। यही नहीं हर कॉलेज में एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन की स्थापना भी अनिवार्य कर देनी चाहिए। यही नहीं हर छात्र के पास विश्वविद्यालय/कॉलेज/संस्थान के प्रॉक्टर (कुलानुशासक) का मोबाइल नंबर होना चाहिए, ताकि वो समय रहते सूचित कर सके।
हालांकि फिलहाल ज्यादातर तकनीकी संस्थानों में हेल्पलाइन सेवाएं पिछले साल ही शुरू हो चुकी हैं, लेकिन प्रॉक्टर के नंबरों का वितरण अभी तक कहीं नहीं दिखा है।












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