पोलावरम बांध के रास्ते में नई बाधा

पोलावरम बांध के रास्ते में नई बाधा
उमर फ़ारूक़

बीबीसी संवाददाता, हैदराबाद

देश की कई बाँध परियोजनाओं को पूरा करने में देर इसलिए भी हुई है क्योंकि वो पर्यावरण संबंधी कई मानकों पर खरी नहीं उतरतीं.आंध्र प्रदेश की लगभाग 60 वर्ष पुरानी पोलावरम परियोजना के निर्माण में एक और बाधा सामने आ गई है.अब केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर पूछा है कि उसने इस परियोजना के संबंध में पड़ोसी राज्यों उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक सुनवाई के बिना ही काम कैसे शुरू करवा दिया.

नोटिस में कहा गया है कि अगर राज्य सरकार ने इसका जवाब दस दिनों के भीतर नहीं दिया तो उसे कारण बताओ नोटिस जारी किया जाएगा.पर्यावरण मंत्रालय की इस कार्रवाई ने दिल्ली में भले ही हलचल मचा दी हो लेकिन आंध्र प्रदेश सरकार इसे ज़्यादा महत्त्व देने के मूड में दिखाई नहीं दे रही है.

राज्य के सिंचाई मंत्री पुन्नाला लक्ष्मैया का कहना है कि "जो कांग्रेस पार्टी की बैठक में हिस्सा लेने दिल्ली गए हुए हैं, उनका कहना है कि नोटिस दिए जाने के संबंध में उनके पास कोई सूचना नहीं है.हमें इसके बारे में केवल मीडिया से ही सूचना मिली है."सिंचाई मंत्री ने इन आरोपों का खंडन किया कि उन्होंने पोलावरम के विषय में किसी क़ानून का उल्लंघन किया है.पर्यावरण मंत्रालय ने अपनी नोटिस में सवाल उठाया है कि गत डेढ़ वर्षों से बार बार याद दिलाने के बावजूद आंध्र प्रदेश सरकार ने उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के उन इलाकों में सार्वजनिक सुनवाई क्यों नहीं करवाई जो पोलावरम के निर्माण की सूरत में डूब सकते हैं.

नोटिस में यह भी पूछा गया है कि आंध्र सरकार ने पर्यावरण मानकों में आवश्यक मंज़ूरी करवाए बिना ही निर्माण का काम कैसे जारी रखा.केंद्रीय जल आयोग के विशेषज्ञों की एक समिति ने मार्च 2009 में ही आंध्र प्रदेश सरकार से कहा था कि वो उड़ीसा की सबरी नदी और छत्तीसगढ़ की सिलेरू नदी पर पुश्ते और बाधाओं के निर्माण को भी इस परियोजना का हिस्सा बनाए ताकि उन दो राज्यों के इलाक़ों को डूबने से बचाया जा सके.

लेकिन आंध्र सरकार ने इस संबंध में कोई भी क़दम नहीं उठाया.पर्यावरण मंत्रालय ने आंध्र प्रदेश सरकार को यह नोटिस एक ऐसे समय पर भिजवाई है जब उड़ीसा की सरकार ने पोलावरम के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील दाख़िल करने का फ़ैसला कर लिया था.दूसरी ओर आंध्र प्रदेश के मुख्य मंत्री केंद्र से यह अनुरोध कर रहे थे कि पोलावरम परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दिया जाए और 90 प्रतिशत राशि उपलब्ध करवाई जाए.

गोदावरी नदी पर बनने वाली 20 हज़ार करोड़ रुपए की यह परियोजना अगर बन जाती है तो यह दक्षिणी भारत की सबसे बड़ी परियोजना होगी.इसमें न केवल 25 लाख एकड़ भूमि की सिंचाई का प्रस्ताव है बल्कि उससे कई इलाक़ों को पीने का पानी भी उपलब्ध होगा और बिजली का उत्पादन भी होगा.सबसे पहले इस तरह की परियोजना का सुझाव 1947 में रखा गया था और उस समय उस पर आने वाले ख़र्च का अनुमान केवल 129 करोड़ रुपए लगाया गया था.

लेकिन कई दशक गुज़र जाने के बाद भी ये एक अधूरा सपना ही बना हुआ है.पिछले दिनों कई परियोजनाएं पर्यावरण क़ानूनों के उल्लंघन को लेकर सवालों में घिरी हैं.वाईएस राजशेखर रेड्डी के मुख्य मंत्री बनने के बाद 2004 में इस परियोजना के काम में कुछ प्रगति हुई.इसके असल डिज़ाइन में परिवर्त्तन करके सरकार ने गोदावरी और कृष्णा नदियों को जोड़ने का फ़ैसला किया ताकि समुद्र में बह जाने वाले गोदावरी के पानी को कृष्णा के इलाक़े में सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जा सके.

इस परियोजना को उन्होंने 'इंदिरा सागर' का नाम दिया था.इस परियोजना के डिज़ाइन को लेकर कई विवाद भी उठ खड़े हुए.इस परियोजना की वजह से आंध्र प्रदेश के खम्मम ज़िले और पड़ोसी राज्यों, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में कई इलाक़ों के डूब जाने की बात की गई.आशंका ये भी व्यक्त की गई कि इसके चलते क़रीब दो लाख लोग विस्थापित हो सकते हैं.इस परियोजना से खम्मम ज़िले के 277 गाँवों के अलावा , ईस्टर्न घाट के 150 घन किलोमीटर इलाक़े और 3000 हेक्टेयर जंगल को भी ख़तरा है.

खम्मम ज़िले के आदिवासी इलाक़ो के लोग और दोनों पड़ोसी राज्यों की सरकारें इसका विरोध करते आ रहे हैं.इसके बावजूद राजशेखर रेड्डी सरकार ने नवंबर 2004 में इस परियोजना के काम का उद्घाटन कर दिया तबसे राज्य सरकार इस परियोजना के कामों पर 6000 करोड़ रुपए ख़र्च कर चुकी है.काम शुरू होने के बाद भी इस परियोजना ने कई उतार चढ़ाव देखे.

दिसंबर 2007 में राष्ट्रीय पर्यावरण एपीलेट अथॉरिटी ने इस परियोजना को दी गई पर्यावरण संबंधी मंज़ूरी को रद्द कर दिया था.लेकिन इसी वर्ष सितंबर में केंद्र सरकार ने इस परियोजना के लिए आवशक तमाम मंज़ूरियाँ दे दीं.लेकिन अब पर्यावरण मंत्रालय की कार्रवाई ने एक बार फिर इस परियोजना के भविष्य पर प्रश्न चिह्न लगा दिया है.

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