कौमी एकता की मिसाल है नरहड़ दरगाह

झुंझुनू जिला मुख्यालय से 40 कि.मी. व चिड़ावा से 10 कि.मी. और पिलानी के निकट एक छोटा सा गांव नरहड़ बसा हुआ है। इसमें गांव के एक ओर हजरत हाजिब शकरबार शाह की प्राचीन दरगाह स्थित है। इसी के कारण यह स्थल एक तीर्थ स्थल के रूप में प्रसिद्घि प्राप्त कर चुका है। यहां चिड़ावा व पिलानी कस्बों से देवरोड़ होते हुए बसों से पहुंचा जा सकता है।

नरहड़ में हर वर्ष जन्माष्टमी के दिन दरगाह के बाहर एक बड़ा मेला लगता है जिसमें बिना-किसी भेदभाव के न केवल मुसलमान वरन सभी धर्मो और सम्प्रदायों के अनुयायी लाखों की संख्या में जायरीन के रूप में भाग लेकर बाबा से मनौतियां मांगते हैं।

तीन दिवसीय मेले में राजस्थान ही नहीं बल्कि हरियाणा, गुजरात, पंजाब, मध्यप्रदेश, दिल्ली, आन्ध्रप्रदेश व महाराष्ट्र आदि प्रान्तों से बड़ी संख्या में श्रद्घालु भक्त व जायरीन आते हैं। मेले की विशेषता यह है कि यह मेला कृष्ण भगवान के जन्म दिन पर लगता है, जिसकी वजह से बड़ी संख्या में हिन्दू धर्मावलम्बी भी बाबा की मजार पर अपने श्रद्घा सुमन अर्पित करते हैं।

जायरीन द्वारा मजार पर चादरें, कपड़े, नारियल, मिष्ठान और यहां रखी तिजोरी में नकदी भी चढ़ाई जाती है। भक्तजनों के कारण यहां की दरगाह धार्मिक सद्भाव, न्याय एवं प्रेम का केन्द्र बन गई है।

नरहड़ ग्राम की अपनी एक खासियत है। बताया जाता है कि कभी नरहड़ ग्राम प्राचीन जोड़ राजपूत राजाओं की राजधानी थी और उस समय यहां 52 बाजार थे। पठानों के जमाने में यहां के लोदी खां गर्वनर हुआ करते थे। उनके व राजपूतों के बीच युद्घ में वे लगातार हारते चले गए। यहां घोड़े व सैनिक अपने आपको थका महसूस करने लगे, तभी पीर बाबा ने दिव्य वाणी में कहा-तुम कैसे जीत सकते हो? तुम हमारी मजार पर घोड़े दौड़ाते हो? यदि मजार से हटकर लड़ोगे तो जीत जाओगे।

दिल्ली के सैनिकों ने मजार से हटकर लड़ाई की तो वे जीत गए। उसी समय से यहां हजरत शकरबार पीर बाबा के प्रति आस्था कायम है। इसी के बाद मजार व दरगाह का निर्माण कराया गया। कहा जाता है कि पीर बाबा भी शहीदों में से हैं। आज यहां जायरीनों का नित्य प्रति तांता-सा लगा रहता है।

दरगाह में प्रवेश करने वाले प्रत्येक जायरीन को तीन दरवाजों से गुजरना पड़ता है। जिसमें पहला बुलन्द दरवाजा, दूसरा बसंती दरवाजा और तीसरा बगली दरवाजा है। इसके बाद मजार शरीफ व मस्जिद है।

बुलन्द दरवाजे का निर्माण करीब दो दशक पूर्व सरदारशहर निवासी व आन्ध्रप्रदेश प्रवासी प्रताप सिंह छाजेड़ ने करवाया था। यह बुलन्द दरवाजा 75 फिट ऊंचा व 48 फिट चौड़ा है। मजार का गुम्बद चिकनी मिट्टी से निर्मित है, जिसमें पत्थर नहीं लगाया गया है। कहते हैं कभी इस गुम्बद से शक्कर बरसती थी। इसीलिए बाबा को शकरबार का नाम दिया गया है।

एक ओर पीर बाबा के साथी भी दफन किए गए हैं जिन्हें 'घरसों वालों का मजार' कहा जाता है। यहां 'रातीजगा' और 'जिकड़ी' के कार्यक्रम भी रखे जाते हैं। कव्वाली के कार्यक्रमों का रूप श्रद्घाजंलियों जैसा होता है। यहां जात-जडूलों के संस्कार भी करवाए जाते हैं।

कहा जाता है कि यहां की सन्दल मिट्टी के कुण्ड की मिट्टी को रगड़ने से मानसिक विकृति वाले व्यक्ति ठीक होकर जाते हैं। यहां मान्यतानुसार पेड़ पर डोरे बांधने की परम्परा भी है। दरगाह के बाहर भी जायरीनों के ठहरने के लिए मुसाफिर खाने बने हुए हैं। यहां गरीबों को मुफ्त भोजन भी करवाया जाता है।

दरगाह के मुख्य द्वार पर बनी खिड़की से निकल कर एक ओर से दूसरी ओर जाने का मतलब यहां 'स्वर्ग द्वार' तक पहुंचना है। दरगाह में मजार के निकट महिलाओं का प्रवेश वर्जित है।

आज से करीब 80 वर्ष पूर्व मजार के प्रवेश द्वार वाले किवाड़ों पर चांदी की पत्तर अहमद बक्स रूकुबुद्दीन ने हिजरी सन् 1351 में चढ़ाए थे। इसकी निर्माण की तारीख में 1353 डिजिट निकलते हैं। इसी प्रकार हरियाणा के श्रद्घालु सवाई सिंह ने भी ब्राश निर्मित 45 किलोग्राम का छतर भी बनवाकर गुम्बद पर लगवाया है।

नरहड़ दरगाह कमेटी के सदर अब्दुल लतीफ पठान व सचिव महमूद खान नूआं ने बताया कि गुरूवार (2 सितम्बर) को जन्माष्टमी के दिन रात 11 बजे से चिड़ावा के दुलिया राणा ख्याल पार्टी द्वारा शकरबार की हाजरी में ख्याल गायकी के कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाएंगे और रात्रि 12 बजे श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाएगा। बुधवार से ही कव्वालियों के कार्यक्रम प्रारंभ हो गए हैं। मेला आयोजन समिति ने मेले की सभी व्यवस्थाएं पूर्ण करली हैं।

इंडो-एशिययन न्यूज सर्विस।

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