दंतहीन बना उत्तराखण्ड पुलिस शिकायत प्राधिकरण

प्राधिकरण के अध्यक्ष शंभूनाथ श्रीवास्तव इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त प्रधान न्यायाधीश हैं। राज्य सचिवालय के अधिकारियों के मुताबिक प्राधिकरण के ही कुछ लोगों के कथित षडयंत्रों के कारण उन्होंने राज्य सरकार से प्राधिकरण को ही भंग करने की सिफारिश कर डाली है।

विडम्बना तो यह है कि प्राधिकरण के कायदे कानून बनाते समय सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों को भी दरकिनार किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अनदेखी करते हुए पुलिस विभाग के तत्कालीन रहनुमाओं ने प्राधिकरण के कायदे-कानून ऐसे बना दिए हैं, जिसके कारण वर्तमान परेशानियां उभर कर सामने आ रही हैं और वह दंतहीन बन कर रह गया है।

मसलन, उत्तराखण्ड पुलिस अधिनियम 2007 की धारा 65 (3) को देखें तो इसमें साफ लिखा है, "चार स्वतंत्र सदस्यों में से एक सदस्य ऐसा होगा जिसे विधि क्षेत्र का समुचित ज्ञान हो।" इस अहर्ता के लिए कोई पद या अनुभव निर्धारित नहीं किया गया है।

धारा 65 (4) देखें तो इसमें कहा गया है कि अधिकतम पांच सदस्यों वाले प्राधिकरण के अध्यक्ष पद पर राज्य सरकार स्वतंत्र सदस्यों में से किसी एक को नियुक्त करेगी।

बावजूद इन पेचीदगियों के वर्तमान अध्यक्ष के दो साल के कार्यकाल में प्राधिकरण ने कुल 332 मामलों में से 186 का निष्पादन किया है। जबकि 136 मामले अब भी लंबित हैं।

सबसे बड़ी बात तो है कि प्राधिकरण के अध्यक्ष केवल डाकिया बन कर रह गए हैं। उनकी यह स्थिति इसलिए है कि अधिनियम की धारा 71 (1) के अनुसार प्राधिकरण के कृत्य निर्धारित करते हुए कहा गया है कि प्राधिकरण, उसके द्वारा सीधे प्राप्त पुलिसकर्मियों के अवचार की शिकायतें आगे की कार्रवाई के लिए पुलिस महानिदेशक को अग्रसारित करेगा, परन्तु गुमनाम शिकायतों का कोई संज्ञान नहीं लिया जाएगा।

अधिनियम में पुलिसकर्मी की परिभाषा तय करते हुए कहा गया है कि पुलिसकर्मी ऐसे लोग होंगे जिनकी नियुक्ति पुलिस महानिदेशक अथवा उनके अधीनस्थ किसी अधिकारी व प्राधिकारी द्वारा हुई हो। इसके तहत पुलिस अधिकारियों को साफ बच निकलने का मौका मिलता है।

पुलिस सुधार कानूनों को अमल में लाने के लिए प्रयत्नशील एवं मुख्य भूमिका निभाने वाले उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह का कहना है कि उत्तराखण्ड सहित कई बड़े राज्यों की सरकारों ने अपने नफे-नुकसान और स्वार्थ के हिसाब से अधिनियम बना लिए हैं। जिनमें उच्चतम न्यायालय के आदेशों को नजरअंदाज किया गया है।

उन्होंने कहा कि प्राधिकरण को जीवन्त बनाने के लिए उच्चतम न्यायालय के आदेशों का अनुपालन करना आवश्यक है, साथ ही यह दायित्व न्यायालय का भी है की वह अपने द्वारा दिए गए आदेशों का अनुपालन ठीक ढंग से कराए। सिंह ने उम्मीद जताई कि सर्वोच्च न्यायालय के नवनियुक्त प्रधान न्यायाधीश कपाड़िया संवेदनशील हैं और वह नियमों को ठीक ढंग से लागू करवाएंगे।

उच्चतम न्यायालय ने प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार के खिलाफ एक फैसले में सन् 2006 में यह निर्णय दिया था कि पुलिस आचरण के लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए। इसके लिए राज्यों में राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन अनिवार्य किया गया। उच्चतम न्यायालय ने प्राधिकरण की रूपरेखा और कार्यप्रणाली के लिए कुछ आदेश निर्धारित किए गए थे जिनका पालन राज्यों के प्राधिकरण द्वारा होना था।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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