जब इंग्लैंड में होता था ग़रीबों का शोषण

जब इंग्लैंड में होता था ग़रीबों का शोषण

इंग्लैंड में 19वीं शताब्दी के समाज सुधारों से पहले ग़रीब लोगों के जीवन और हालात के बारे में चौंकानेवाले तथ्य सामने आए हैं.

कुछ दिनों पहले इंग्लैंड के राष्ट्रीय अभिलेखागार ने उस समय के कुछ रिकॉर्ड जारी किए हैं जिससे पता चलता है कि औद्योगिक क्रांति शुरु होने से पहले वहाँ के ग़रीबों की क्या सामाजिक स्थिति कितनी बदतर थी.

दस्तावेज़ों से पता चला है कि औद्योगिक क्रांति से कुछ ही पहले वर्ष 1834 के पूअर लॉ अमेंडमेंट एक्ट के समय की सामाजिक तस्वीर उस विवरण से ज़्यादा भिन्न नहीं है जो चर्चित अंग्रेज़ी साहित्यकार चार्ल्स डिकेन्स ने प्रस्तुत किए थे.

इन दस्तावेज़ों के मुताबिक इंग्लैंड के ग़रीब 1830 तक अपने ही सामाजिक परिवेश में रहते थे और अपने जीवन यापन के लिए स्थानीय स्तर पर निर्भर थे.

लेकिन इससे उच्च वर्ग के लोग चाहते थे कि निम्न वर्ग और बेघर ग़रीबों को पकड़कर अपने कारख़ानों में काम कराया जाए.

इन कारख़ानों काम करने और वहाँ लोगों के रहने की स्थितियां बहुत ख़राब थीं. वहाँ रहनेवाले पुरूष और महिलाएं इस वजह से पागल तक हो जाया करते थे.

बदहाली और शोषण के इस दौर में कारख़ानों में काम कर रहे नौ साल की उम्र तक के बच्चों को संतुलित आहार के नाम पर सिर्फ़ सूप, खिचड़ी या दलिया दिया जाता था.

इंग्लैंड से संबंधित 19वीं शताब्दी के राष्ट्रीय अभिलेखागार के इन नए दस्तावेजों में कुछ रोंगटे खड़े कर देनेवाले उदाहरण हैं.

इनके मुताबिक ब्रॉम्सग्रोव में थॉमस फ़्लेचर नाम के एक डॉक्टर ने चर्म रोग से पीड़ित एक बच्चे पर प्रयोग करने के लिए उसे पोटैशियम सल्फ़ेट से नहला दिया था. बच्चा मर गया लेकिन मामले की सुनवाई में फ़्लेचर छूट गए.

इन दस्तावेजों के मुताबिक नॉरफ़ॉल्क में एक सज़ायाफ़्ता की पत्नी रेबेका बक एक बार एक कारख़ाने से भाग निकलीं लेकिन बाहर उन्हें अपना जीवन चलाने का कोई साधन न मिला.

वो वापस कारख़ाने में आना चाहती थीं लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करने दिया गया और जल्द ही वे ठंड के कारण मौत की शिकार हो गईं. इस मामले की भी जांच हुई लेकिन रेबेका का मालिक निर्दोष साबित हो गया.

औद्योगिक क्रांति के नायकों के बारे में तो बहुत कुछ कहा गया है लेकिन ये पहली बार है कि अब उसके शिकार हुए लोगो की कहानियों पर से पर्दा उठ रहा है.

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