भोपाल मामले पर अमरीका की सफ़ाई

भोपाल मामले पर अमरीका की सफ़ाई

अमरीका के राष्ट्रीय सुरक्षा उप सलाहकार फ्रोमन माइकल ने इस बात का खंडन किया है कि वे अमरीकी कंपनी डाओ केमिकल्स को लेकर भारत पर किसी तरह का दबाव डालना चाहते हैं.

उन्होंने एक बयान में कहा है कि वे साफ़ करना चाहते हैं कि विश्व बैंक से रियायत और डाउ केमिकल्स दो अलग-अलग मामले हैं और उनमें आपस में कोई संबंध नहीं है.

उल्लेखनीय है कि भारत में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने फ़ोमन माइकल को एक विश्व बैंक से रियायती दरों पर मदद जारी रखने के लिए एक मेल भेजी थी जिसके जवाब में उन्होंने कहा था कि डाउ केमिकल्स के मामले में उठ रहे शोर से निवेश के माहौल पर असर दिख सकता है.

विश्वेषकों ने इसे अमरीका की ओर से दबाव और धमकी के रुप में देखा था.

हालांकि ख़ुद मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने भी कहा था कि वे इन दोनों मामलों में कोई संबंध नहीं देखते हैं.

अमरीकी दूतावास के ज़रिए भेजे गए अपने बयान में फ़्रोमन माइकल ने कहा है, "अहलूवालिया को लिखे एक निजी मेल से जुड़ी ख़बरों के बारे में मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैं दो अलग मसलों को जोड़ नहीं रहा था और न ही मैं किसी तरह की धमकी दे रहा था."

उन्होंने इस तरह के किसी भी निष्कर्ष को ग़लत बताया है.

भोपाल गैस त्रासदी के बारे में उन्होंने कहा है, "मैं इस बात से निराश हुआ कि मैंने जो कुछ भी लिखा उसका अर्थ यह लगाया गया कि मैं भोपाल त्रासदी के परिमाण को कम करना चाहता हूँ."

उन्होंने कहा है कि भोपाल में जो कुछ हुआ वह एक भयानक त्रासदी थी और उसके बारे में कुछ भी तय करना भारतीयों के हाथ में है और अमरीका इस प्रक्रिया में कोई दखल नहीं देना चाहता.

टेलीविज़न चैनल 'टाइम्स नाउ' ने अपनी एक ख़बर में कहा था कि उसके हाथ एक ई-मेल लगी है जो अमरीका के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार फ्रोमन माइकल ने भारत के योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया को लिखी है.

चैनल के अनुसार उन्होंने लिखा है, “डाओ केमिकल्स के मामले पर बहुत शोर सुन रहे हैं. मुझे इस मामले की बहुत ज़्यादा जानकारी तो नहीं है लेकिन बेहतर होगा कि हम ऐसी बातों से बचें जिसका निवेश के माहौल पर ख़राब असर पड़े.”

स्पष्ट है कि निवेश से उनका इशारा भारत में अमरीकी निवेश की ओर था और विश्लेषकों ने इस ईमेल को अमरीका की ओर से एक चेतावनी की तौर पर देखा था.

ये ईमेल मोंटेक सिंह अहलूवालिया के ईमेल के जवाब में आई थी जिसमें उन्होंने फ्रोमन माइकल से विश्व बैंक से रियायती दर पर मदद जारी रखने के लिए अमरीकी मदद की गुज़ारिश की थी.

उल्लेखनीय है कि भोपाल गैस त्रासदी पर हाल ही में आए एक अदालती फ़ैसले के बाद से सरकार पर एक बार फिर दवाब बढ़ा है कि वह अमरीकी कंपनी से पर्याप्त हर्ज़ाना वसूल करे और पूर्व चेयरमैन वारेन पर कार्रवाई करना चाहिए.

डाओ केमिकल्स की भूमिका पर भारत सरकार कह चुकी है कि वो मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फ़ैसले का इंतज़ार कर रही है.

अदालत को ये तय करना है कि जवाबदेही किसकी बनती है—यूनियन कार्बाइड, डाओ या एवरेडी की.

वाशिंगटन से विदेश मामलों की जानकार पत्रकार सीमा सिरोही का कहना है कि इस तरह की भाषा अक्सर दबाव डालने के लिए इस्तेमाल की जाती है.

उनका कहना था कि जब 1984 में भोपाल गैस त्रासदी हुई थी उस वक्त भी जॉर्ज बुश सीनियर ने भारत से कहा था कि मामले को ज़्यादा तूल नहीं दें क्योंकि इससे निवेश पर असर पड़ेगा.

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