थान स्वे की भारत यात्रा का विरोध

शालू यादव
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
दिल्ली में रह रहे बर्मा के निर्वासित लोगों ने सोमवार को जंतर मंतर पर बर्मा के सैन्य शासक जनरल थान स्वे के ख़िलाफ ज़ोरदार प्रदर्शन किया. उन्होंने बर्मा में लोकतंत्र की स्थापना की मांग करते हुए जनरल थान स्वे के ख़िलाफ़ नारे लगाए और उनकी भारत यात्रा का पुरज़ोर विरोध किया.
नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी पार्टी से बर्मा के पूर्व सांसद डॉ. टिंट स्वे और दिल्ली के बर्मा केंद्र की अगुआई में हुए इस प्रदर्शन में बर्मा के लोगों ने लोकतंत्र और मानवाधिकार की मांग के साथ अपनी नेता आंग सांग सू ची पर से नज़रबंदी हटाने की भी मांग की.
इस साल बर्मा में होने वाले संसदीय चुनाव के मुद्दे पर शंका जताते हुए टिंट स्वे ने कहा "थान स्वे दुनिया के सबसे ख़राब तानाशाह है. उनके शासन के रहते बर्मा में निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव हो पाना असंभव है."
‘थान स्वे वापस जाओ’ का नारा लगाते हुए बर्मा के लोगों ने भारत से अपील की कि वो जनरल स्वे का समर्थन न करें क्योंकि वे एक अलोकप्रिय शासक हैं और बर्मा में कई बौद्ध भिक्षुकों और लोकतंत्र समर्थकों की मौत के ज़िम्मेदार हैं.
समता पार्टी की पूर्व नेता जया जेटली ने भी इस विरोध प्रदर्शन में भाग लिया और बर्मा के लोगों के साथ मिलकर वहां के सैन्य राज के ख़िलाफ़ नारे लगाए. उन्होने कहा "भारत सरकार को थान स्वे के शासन को मान्यता नहीं देनी चाहिए. अगर भारत लोकतंत्र का समर्थन नही करेगा, तो भारत की डेमोक्रेसी एक ‘हिपोक्रेसी’ बन जाएगी."
‘भारत से ख़ासी उम्मीद नहीं’
हालांकि बर्मा की नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी पार्टी अपने लोकतंत्र स्थापित करने की कोशिशों पर भारत से सहयोग की मांग करती रही है, लेकिन पार्टी को भारत सरकार से कोई उम्मीद नहीं है.
कयास लगाए जा रहें हैं कि थान स्वे की यात्रा के दौरान बर्मा के चुनावों पर नहीं बल्कि दोनों देशों के बीच सुरक्षा, व्यापार और व्यवसाय पर बातचीत होगी. जनरल थान स्वे पांच दिन के भारत दौरे पर हैं. वे सोमवार रात को दिल्ली पहुंचेंगे और मंगलवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाक़ात करेंगे.
बर्मा की निर्वासित सरकार के प्रतिनिधि डॉ टिंट स्वे ने कहा "थान स्वे का भारत में स्वागत किया जाना एक दुर्भाग्यपूर्ण बात है. न तो उनकी इस यात्रा से भारत को कोई लाभ होगा और न ही बर्मा को. मुझे नहीं लगता कि भारत उनसे बर्मा लोकतंत्र के बारे में कोई वादा लेने की कोशिश करेगा. लेकिन बर्मा में लोकतंत्र स्थापित करने के लिए हमारा संघर्ष जारी रहेगा."
बर्मा में 1990 में आख़िरी बार चुनाव हुए थे जिसमें नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी पार्टी जीत गई थी लेकिन उसे सत्ता में आने नहीं दिया गया था.
पार्टी को जबरन अयोग्य ठहरा दिया गया है और इस साल होने वाले चुनाव में सू ची के चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगा दी गई है.












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