सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से घरेलू महिलाएं खुश
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि संसद को यह सुनिश्चित कराने के लिए विभिन्न कानूनों में संशोधन पर विचार करना चाहिए कि घरेलू महिलाओं के योगदान को दुर्घटना दावों और शादी की संपत्ति के बंटवारे में पूरी तरह महत्व दिया जाए।
अदालत ने इस बात पर आश्चर्य प्रकट किया कि जनगणना में लगभग 36 करोड़ घरेलू महिलाओं को भिखारियों, वेश्याओं और कैदियों के साथ आर्थिक रूप से अनुत्पादक श्रेणी में रखा गया है।
राजधानी की कई सारी महिलाओं ने शिकायत की कि घरेलू महिलाएं तमाम सारे काम करती हैं, इसके बावजूद उन्हें हल्के में लिया जाता है, क्योंकि वह बाहर काम पर नहीं जातीं।
स्वतंत्र लेखक और घरेलू महिला, अनुराधा रामनन ने आईएएनएस को बताया, "घरेलू महिलाओं को भिखारियों, वेश्याओं और कैदियों के साथ आर्थिक रूप से अनुत्पादक श्रेणी में रखना समाज के लैंगिक पूर्वाग्रह को दर्शाता है।"
रामनन ने कहा, "किसी महिला द्वारा अपने परिवार के लिए वर्षो तक किए गए श्रम के सम्मान पर प्रश्न खड़ा किया जा रहा है।"
हाल ही में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी की अपनी नौकरी छोड़ने वाली, युवा घरेलू महिला, स्मिता ने कहा, "जब भी आप 'हाउसवाइफ' कहते हैं, लोग इसे इस रूप में लेते हैं कि आप काम नहीं कर रही हैं। यह गलत है।"
स्मिता ने कहा, "शुरू में मुझे खराब लगा, क्योंकि लोगों ने समझा कि मैं काम नहीं कर रही हूं, लेकिन अब मैं सोचती हूं कि मैं समाज में बराबर योगदान कर रही हूं, क्योंकि घरेलू काम किसी कार्यालयी काम से ज्यादा कठिन है।"
अंजू पांडे (35) कहती हैं, "महिलाओं को अपने काम के लिए आर्थिक रूप से श्रेय नहीं मिला है। उन्हें हमेशा हल्के में लिया गया है। मैं खुश हूं कि अदालत ने यह फैसला दिया है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












Click it and Unblock the Notifications