बुलंद आवाज से बनता है प्रभुत्व
अध्ययन में बताया गया है कि किसी व्यक्ति की स्वाभाविक या कृत्रिम आवाज का प्रभुत्व इस बात पर कोई असर नहीं डाल पाता कि वह अपने प्रतिद्वंद्वी की आवाज से कितना सजग है।
यह निष्कर्ष पेंसिल्वानिया स्टेट युनिवर्सिटी (पीएसयू) के मानव विज्ञान विज्ञानी द्वय सारा वोल्फ और डेविड पुट्स द्वारा किए गए एक शोध में सामने आया है।
इस अध्ययन के लेखकों ने पहली बार इस बात का पता लगाया है कि जब कोई व्यक्ति अपने प्रतिद्वंद्वी के सामने होता है तो क्या उस व्यक्ति का खुद का प्रभाव, सामने वाले व्यक्ति की मुखरता के प्रति उसकी सजगता को प्रभावित करता है या नहीं।
अध्येताओं ने इस संदर्भ में दो अध्ययन किया। इसमें कई सारे पुरुषों को शामिल किया गया और उनसे पुरुष आवाजों की रिकॉर्डिग का मूल्यांकन करने के लिए कहा गया, ऐसी आवाजों का जो कि बुलंदी के स्तर में अलग-अलग थीं। इनमें निम्न, अधिक मुखर आवाज से लेकर उच्च, कम मुखर आवाज को शामिल किया गया था।
पहले अध्ययन में इस बात पर गौर किया गया कि प्रतिभागियों ने आत्म मूल्यांकित भौतिक प्रभुत्व के संबंध में दूसरे पुरुषों के प्रभुत्व का किस रूप में मूल्यांकन किया।
अनुमान है कि अधिक बुलंद आवाज अधिक प्रभावी होती है। कुल मिलाकर जिन व्यक्तियों ने लड़ाकूपन के मामले में खुद को अधिक अंक दिए, उन्होंने अन्य व्यक्तियों के प्रभुत्व के लिए कम अंक दिए।
लेकिन पुरुषों का आत्म मूल्यांकित भौतिक प्रभुत्व इस बात से संबंधित नहीं था कि वे जब अन्य पुरुषों के सम्मुख होते हैं तो उनकी मुखरता के प्रति वे कितने सजग होते हैं।
पीएसयू की ओर से जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि दूसरे अध्ययन में इस बात का परीक्षण किया गया है कि पुरुषों के भौतिक प्रभुत्व के उपक्रम, प्रभुत्व दरों को कितना प्रभावित करते हैं।
ये निष्कर्ष स्प्रिंगर्स की पत्रिका 'बिहेविओरल इकोलॉजी एंड सोसिओबायोलॉजी' के ऑनलाइन संस्करण में प्रकाशित हुए हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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