गुरुदेव के शांत मन में भरा पड़ा था रचना संसार (रवींद्रनाथ टैगोर की 150वीं जयंती पर विशेष)

नई दिल्ली, 7 मई (आईएएनएस)। 'जहां चित्त भय से शून्य हो, जहां हम गर्व से सिर उठाकर चल सकें.जहां ज्ञान मुक्त हो.' का उद्घोष करने वाले नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के जन्म के 150 वर्ष बाद भी इस महाद्वीप में उनके कद का कोई शख्स सामने नहीं आया है।

गुरुदेव अपने माता-पिता की 14वीं संतान थे। छह फुट दो इंच के इस शख्स ने अपना सिर ऊंचा बनाए रखने के लिए जीवन भर कड़ी मेहनत की।

टैगोर बेहद शांत तरीके से रचना संसार में डूबे रहते थे। अनेक भाषाओं के जानकारों का कहना है कि पूरी दुनिया में टैगोर की बराबरी का कोई नहीं है। सवाल यह नहीं उठता है कि टैगोर 'माउंट एवरेस्ट' थे, बल्कि अगले 150 वर्ष बाद क्या कोई यह विश्वास करेगा कि इस धरती पर उनके जैसा प्रतिभाशाली और रचनाशील शख्स था।

टैगोर के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने जीवन में कई तरह की समस्याओं को देखा। कहा जाता है कि वर्ष 1913 में जब उन्हें नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई तो उनके एक भाई ने दावा ठोक दिया कि 'गीतांजलि' के असली लेखक टैगोर नहीं हैं।

टैगोर शांडिल्य गोत्र से ताल्लुक रखते थे। गुरुदेव के दादा द्वारकानाथ ने बैंक ऑफ बंगाल में पहले ठाकुर उपनाम से खाता खोला था, जिसे उन्होंने बाद में टैगोर में बदल दिया।

सवाल यह भी उठता है कि क्या गुरुदेव धनवान थे? दरअसल 19वीं सदी में देश के सबसे धनी लोगों में द्वारकानाथ एक थे लेकिन उनकी मौत के बाद 'कार टैगोर एंड कंपनी' दिवालिया हो गई। उस वक्त उनके बेटे देवेन्द्रनाथ इंग्लैंड में थे।

देवेन्द्रनाथ के बारे में कहा जाता है कि वह उद्योगपति के बजाए एक ऋषि थे। कंपनी के दिवालिया होने के बाद उन्होंने सबकुछ बेच डाला लेकिन इसके बावजूद जमींदारी उनके हाथ में थी। वर्ष 1913 के आसपास रवींद्रनाथ को हमेशा इस बात का दुख सताता था कि वह धन अर्जित नहीं कर पाते हैं।

रवींद्रनाथ ने कई बार अपने दोस्तों, संबंधियों और महाजनों से पैसे उधार लिए। एक बार तो उन्होंने अपनी सभी साहित्यिक कृतियों का कॉपीराइट 10,000 रुपये में बेचने की पेशकश की थी लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।

रवींद्रनाथ बाल्यावस्था से ही बांग्ला भाषा में पारंगत थे। गुरुदेव को अपने जीवन काल में कई संबंधियों की मौत के सदमे से गुजरना पड़ा। वह जब केवल 14 वर्ष के थे तो उनकी मां का देहांत हो गया। इस घटना के सात वर्ष बाद उनके बड़े बहनोई की मौत हुई। कुछ ही दिनों बाद उनकी भाभी ने खुदकुशी कर ली। इस घटना का प्रभाव उनके जीवन पर सबसे अधिक पड़ा।

टैगोर परिवार की परंपरा के अनुसार दुल्हन कोलकाता के समीप स्थित 'जोरासान्को भवन' से आती थी। टैगोर की पत्नी मृणालनी भी वहीं से आईं थीं। गुरुदेव की पांच संतानें थी, जिसमें तीन बेटे और दो बेटियां थीं।

पेट संबंधी बीमारी की वजह से मृणालनी का देहांत वर्ष 1902 में हो गया। पत्नी की मौत को लेकर गुरुदेव की आलोचना भी हुई कि वह केवल होम्योपैथी पर ही केंद्रित थे। इसके बाद उनके छोटे बेटे समींद्रनाथ (13 वर्ष) की मौत हो गई। उनकी बड़ी बेटी माधुरीलता की भी मौत 32 वर्ष में हो गई थी।

गुरुदेव के वैवाहिक जीवन को लेकर अफवाहें उड़ीं। उनके बारे में कहा गया कि वह दूसरी शादी करने वाले हैं, फिर खबर आई कि वह एक असमी लड़की से शादी करेंगे। इस खबर से गुरुदेव काफी दुखी हुए और उन्होंने अपने एक पत्रकार मित्र से संपर्क किया था ताकि वह अपना पक्ष रख सकें।

गुरुदेव के जीवन में ब्रिटिश के साथ संबंध हमेशा प्रेम और घृणा का मिश्रण रहा। वह 17 वर्ष की उम्र में अध्ययन के लिए लंदन गए थे। वह भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा में बैठना चाहते थे, उन्होंने उम्र प्रमाण पत्र के लिए आवेदन भी किया था।

गुरुदेव की पहली पुस्तक को उनके दोस्त प्रबोध चंद्र घोष ने प्रकाशित किया था। पुस्तक में बांग्ला कविताओं को संकलित किया गया था। इसका मूल्य 36 पैसा रखा गया था। इस पुस्तक की समीक्षकों ने खूब तारीफ की थी लेकिन किताब की 500 प्रतियां भी नहीं बिक पाईं थी। इसके बाद कोई भी प्रकाशक गुरुदेव की कृतियों को छापने के लिए आगे नहीं आया।

गुरुदेव ने एक बार 1,100 रुपये में 12 ऐसी किताबों का स्टॉक बेच दिया, जिसकी बिक्री नहीं हुई थी। इसके लिए उन्होंने विज्ञापन भी प्रकाशित किया था।

प्रकाशकों के साथ रवींद्रनाथ के संबंध कभी अच्छे नहीं रहे। एक वक्त ऐसा भी आया जब उन्होंने अपनी सभी कृतियों का कॉपीराइट बेचने का फैसला लिया लेकिन वह असफल रहे। नोबेल पुरस्कार हासिल करने के बाद उन्होंने 'विश्व भारती' नाम से प्रकाशन ईकाई की स्थापना की थी।

गुरुदेव आमतौर पर रात्रि 12 बजे सोते थे और तड़के तीन बजे उठ जाते थे। प्रार्थना आदि करने के बाद वह तड़के चार बजे चाय पीते थे, जिसके बाद सुबह सात बजे तक वह लगातार लिखते रहते थे। भोजन करने के बाद वह फिर से लिखने में जुट जाते थे। वह दिन भर पढ़ते और लिखते रहते थे। वह शाम में चार बजे चाय पीते थे और कुछ देर आराम करते थे।

वर्ष 1909 में अलीपुर बम विस्फोट की सुनवाई चल रही थी, जिसमें श्री अरविंदो भी संलिप्त थे। इस मामले में एक अन्य युवा आरोपी उल्लासकर दत्ता ने खुली अदालत में टैगोर के एक गीत को गाने का साहस दिखाया था। दूसरे दिन ही उस गीत का अंग्रेजी अनुवाद समाचार पत्र में प्रकाशित कर दिया गया।

बांग्ला गीतांजलि की 1,000 प्रतियां अप्रैल 1910 में कोलकाता में प्रकाशित हुई थी, जिसके बाद इस पुस्तक के अंग्रेजी अनुवाद को लेकर काम आरंभ हुआ। गुरुदेव ने खुद ही गीतांजलि का अंग्रेजी में अनुवाद किया था, जिसे नोबेल पुरस्कार मिला।

लंदन में रवींद्रनाथ के बेटे रतींद्रनाथ से गीतांजलि के अंग्रेजी अनुवाद की पांडुलिपि खो गई। अगले दिन वह खोया-पाया विभाग गए, संयोग से उन्हें अमूल्य पांडुलिपि मिल गई। रतींद्रनाथ ने यह पांडुलिपि ब्रिटिश नागरिक रोथेन्सटाइन को सौंप दी। उन्होंने एक नवंबर 1912 को इसकी तीन प्रतियां प्रकाशित की थीं।

गुरुदेव को नोबोल पुरस्कार दिए जाने की खबर 14 नवंबर 1913 को कोलकाता पहुंची थी। चार्टर्ड बैंक से 116,269 रुपये का चेक आया था। आयकर विभाग ने तुरंत 2,070.50 रुपये जमा करने के लिए कहा था। आयकर में छूट के लिए एक रुपये का स्टांप शुल्क भी लगाया गया था।

गुरुदेव की जीवनी लिखने वालों को इसके बारे में पता नहीं है कि आखिर यह सब कैसे मुमकिन हुआ। गुरुदेव ने सबसे पहले लगभग 30,000 रुपये का कर्ज चुकता किया था और शेष राशि को कृषि बैंक में जमा कर दिया।

गुरुदेव को नोबेल पुरस्कार मिलने की खबर के साथ कई अफवाहें भी सामने आईं। कुछ लोगों ने कहा कि गीतांजलि गुरुदेव की कृति नहीं है तो किसी ने कहा कि इस पुरस्कार के लिए उन्होंने रिश्वत दिया है।

उधर, नोबेल सम्मान मिलने की खबर के बाद गुरुदेव को शुभकामना देने के लिए दूरदराज के इलाकों से लोग उनके घर पहुंचने लगे। कुछ लोग एक विशेष रेलगाड़ी से हावड़ा से बोलपुर पहुंचे। मेहमानों की इतनी बड़ी संख्या देखकर वह परेशान हो गए थे।

गुरुदेव ने अपने जीवन में शांति से सुख-दुख का सामना किया। वह कभी अपना आपा नहीं खोते थे।

(शंकर प्रसिद्ध बांग्ला उपन्यासकार हैं।)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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