'नक्सली हिंसा 'सामाजिक आतंकवाद' है'
कोलकाता, 7 अप्रैल (आईएएनएस)। कभी नक्सली आंदोलन के एक स्तंभ रहे असीम चटर्जी भी मंगलवार को छत्तीसगढ़ में 76 सुरक्षाकर्मियों की हत्या से आहत हैं। उनका कहना है कि यह नक्सली हिंसा 'सामाजिक आतंकवाद' है और नक्सली 'निर्थक' रक्तपात कर रहे हैं।
चटर्जी 1960 के दशक के आखिर तक नक्सली आंदोलन के एक बड़े शख्स थे। वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी-लेनिनवादी) के संस्थापक चारू मजूमदार के सबसे करीबियों में शामिल थे। 66 चटर्जी कहते हैं कि संसदीय प्रणाली वाले देशों में आंदोलन कभी सफल नहीं हो सकते।
चटर्जी ने आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में कहा, "चीन का मामला अलग तरह का था। वहां सशत्र संघर्ष एक तरह के हिंसक संघर्ष की प्रतिक्रिया में सफल हुआ था। परंतु भारत में संसदीय प्रणाली है। इतिहास साक्षी है कि जिन जगहों पर संसदीय प्रणाली है वहां कभी भी क्रांतिकारी आंदोलन सफल नहीं रहा।"
नक्सलियों की मौजूदा पौध की निंदा करते हुए चटर्जी ने कहा कि आजकल नक्सली लोगों की उपेक्षा करते हुए सिर्फ हथियारों पर भरोसा कर रहे हैं और जंगलों से अपनी गतिविधियां चला रहे हैं।
उन्होंने कहा, "पहली बात कि किसी भी क्रांतिकारी आंदोलन के लिए जिन शर्तो की मौजूदगी आवश्यक है, वे भारत में नदारद हैं। दूसरी बात कि नक्सली वर्ग संघर्ष पैदा करने पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। अगर आप राज्य के खिलाफ बिना वर्ग संघर्ष के लड़ते हैं तो यह सामाजिक आतंकवाद है। जो रक्तपात हो रहा है, वह निर्थक है।"
चटर्जी 1970 में भाकपा (माले) की केंद्रीय समिति में सबसे कम उम्र के सदस्य थे। बाद में चटर्जी की गिरफ्तारी हुई। वह अपने समय के नक्सलियों के संघर्ष को मौजूदा नक्सलियों की वारदातों से अलग देखते हैं। उनका कहना है, "नक्सलबाड़ी आंदोलन भूमि के लिए था। वह एक सही कदम था। वह आज भी प्रासंगिक है। यह बात सही है कि लोगों को मारने की हमारी नीति गलत थी। "
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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