सरन के इस्तीफे की वजह रमेश तो नहीं
उच्च पदस्थ सूत्रों ने कहा है कि सरन और रमेश अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर औपचारिक और अनौपचारिक वार्ताओं में भारतीय पक्ष को रखने में मतभेदों के लिए जाने जाते रहे हैं। जलवायु परिवर्तन वार्ता दल के सदस्यों ने बताया है कि सरन पिछले वर्ष दिसंबर में हुए कोपेनहेगन सम्मेलन के पहले ही कार्बन उत्सर्जन की मात्रा में कटौती की घोषणा किए जाने के खिलाफ थे।
जलवायु परिवर्तन पर एक वार्ताकार ने बताया, "क्योटो प्रोटोकाल को बरकरार रखने या न रखने को लेकर भी दोनों नेताओं के बीच गंभीर मतभेद रहे हैं। सरन क्योटो प्रोटोकाल को बरकरार रखने के प्रति पूरी तरह दृढ़ थे, वहीं रमेश इस मामले को लेकर अपेक्षाकृत नरम थे।" सरन ने हालांकि पद छोड़ने का कोई और कारण होने से इंकार किया है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने उनसे कहा था कि पर्यावरण मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में उनकी पदोन्नति कर दी जाएगी।
सरन ने कहा, "यह कोई नई बात नहीं है। मैंने प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को पहले ही सूचित कर दिया है कि 14 मार्च को उनका आखिरी कार्य दिवस होगा।" सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने यह कदम इसलिए उठाया क्योंकि पिछले दिनों उनसे तीन साल कनिष्ठ शिवशंकर मेनन को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी, जबकि सरन भी इस दौड़ में शामिल थे।
उल्लेखनीय है कि पिछले साल जुलाई में विदेश सचिव पद से सेवानिवृत्त हुए मेनन को जनवरी में एम. के. नारायणन की जगह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बना दिया गया। भारत की जलवायु परिवर्तन कूटनीति में सरन मुख्य वार्ताकार रहे हैं। पीएमओ की ओर से जारी बयान में कहा गया कि जलवायु परिवर्तन और भारत-अमेरिका परमाणु मुद्दे पर प्रधानमंत्री के विशेष दूत श्याम सरन को 14 मार्च तक कार्यमुक्त होने की अनुमति प्रदान की जाती है।
पीएमओ सूत्रों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन वार्ता के मुद्दे पर भारत की स्थिति एक सक्रिय देश की है। इसलिए प्रधानमंत्री देश की जलवायु कूटनीति को आगे बढ़ाने के लिए सरन को अधिक जिम्मेदारियां देने के इच्छुक थे। पीएमओ की ओर से जारी एक विज्ञप्ति में कहा है, "भारत-अमेरिका परमाणु मुद्दे पर तथा जलवायु परिवर्तन पर प्रधानमंत्री के विशेष दूत श्याम सरन को 14 मार्च से अपना पद छोड़ देने की अनुमति दे दी गई है।"













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