संघर्ष करते हुए ही विदाई चाहते थे छोटे लोहिया
लखनऊ, 23 जनवरी (आईएएनएस)। संघर्ष के बल पर ही भारतीय राजनीति में प्रतिष्ठित मुकाम हासिल करने वाले प्रखर समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र हर उस कमजोर के झंडाबरदार थे जिसकी दबी कुचली आवाज को कहीं तवज्जो नहीं मिलती थी। छोटे लोहिया के नाम से मशहूर मिश्र की अंतिम इच्छा यही थी कि सड़क पर संघर्ष करते हुए ही वह दुनिया से विदाई लें।
अपने निधन से पूर्व मिश्र ने अपने करीबियों से इस बात का जिक्रभी किया था। महंगाई के खिलाफ तीन दिन पूर्व वह राज्य और केंद्र सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे और इलाहाबाद में आंदोलन का नेतृत्व किया था।
मिश्र के करीबी एस. के. राय ने कहा कि इस आंदोलन को मिली सफलता से वह बहुत गदगद थे। उन्होंने कहा था, "अस्वस्थता के बावजूद सड़क पर उतरकर आम आदमी की लड़ाई लड़ना अच्छा लगा। मैं चाहता हूं कि सड़क पर संघर्ष करते ही मेरी मौत हो।"
राय ने कहा कि अब ऐसा लग रहा है जैसे उन्हें अपनी मौत का आभास हो गया था। पेशे से समाज कल्याण अधिकारी राय ने कहा कि मिश्र जी कई बार शुरुआती दौर के संघर्षो की बात करते-करते फिर बीच में चुप्पी साध जाते थे। ऐसा लगता था जैसे अंदर से कुछ सोच-विचार रहे हों। फिर कभी-कभी अचानक वह मुखर हो जाया करते थे। समाजवादी विचारधारा के प्रवर्तक राम मनोहर लोहिया के साथ बिताये अपने लम्हों की वह अक्सर चर्चा करते थे। वह कहते थे कि लोहिया ने उन्हें जीने का मकसद दिया था।
मिश्र के सहपाठी रहे बलिया निवासी सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य विश्वनाथ सिंह उनके साथ बिताए दिनों को याद करते हुए कहते हैं, "किसान रंजीत मिश्र के दो पुत्रों में जनेश्वर बड़े थे। हम अपने गांव शुभनथहीं से दूबेछपरा इंटर कालेज रोजाना दस किलोमीटर पैदल चलकर जाते-आते थे। जरूरतमंदों की मदद करने में वह सदैव आगे रहते थे। वह अक्सर कहा करते थे कि एक दिन मैं गरीबों की आवाज बनूंगा।"
सिंह ने कहा, "हम दोनों ने एक साथ इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातक कला वर्ग में प्रवेश लेकर हिन्दू हॉस्टल में रहना शुरू किया था। पढ़ाई में शुरू से मेधावी रहे मिश्र जल्दी ही छात्र राजनीति से जुड़ गए। छात्रों के मुद्दे पर वह आगे आने लगे। कई आंदोलन किए, जिसमें छात्रों और शहर के लोगों ने उनका बढ़-चढ़ कर साथ दिया। इसी दौरान वह राम मनोहर लोहिया के सम्पर्क में आए और फिर उनके ही होकर रह गये। वर्ष 1967 में उनका राजनैतिक सफर शुरू हुआ।"
राजनीतिक व्यस्तता के बावजूद त्योहारों पर वह अपने गांव शुभनथहीं जाना नहीं भूलते थे। अपने गांव के लोगों के साथ उनका आत्मीय सम्बंध था।
मिश्र के एक करीबी ग्रामीण सुरेंद्र सिंह कहते हैं कि मिश्र जी हर तीज-त्योहार पर गांव आते थे और लोगों के साथ समय व्यतीत करते थे। अभी गत 12 जनवरी को ही वे शुभनथहीं आये थे और मकर संक्रांति के कार्यक्रमों में भाग लिया था। उसी दिन शाम को वह सबके साथ बैठे थे तभी कुछ लोगों ने उनसे कहा कि सत्य के मार्ग पर चलकर समाज की सेवा करना कठिन है, तो मिश्र जी ने कहा कि मान अपमान की चिंता करने वाला समाज का काम नहीं कर सकता।
उन्होंने कहा मिश्र भले ईश तत्व को प्राप्त हो गये लेकिन उनके कृतत्व सदैव राष्ट्र को आलोकित करते रहेंगे। उनका जाना सामान्य नहीं बल्कि एक ऐसे महापुरुष का महाप्रयाण है जिसने राजनीतिक धरातल पर ऐसी रिक्तता छोड़ी जिसकी भरपाई निकट भविष्य में संभव नहीं है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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