सूर्यग्रहण: तमिलनाडु में स्पष्ट दिखा अद्भुत खगोलीय नजारा (लीड-3)
इस बार का सूर्यग्रहण पूर्ण नहीं था लेकिन चंद्रमा ने पूरी तरह से सूर्य को ढंक लिया था, जिससे सूरज का सिर्फ किनारे का हिस्सा ही एक छल्ले के तौर पर देखा गया। आम बोलचाल की भाषा में इसे 'गोल्डन रिंग' या 'रिंग ऑफ फायर' कहते हैं, जबकि पूर्ण सूर्यग्रहण होने पर 'डायमंड रिंग' बनती है। देश में 22 नवंबर 1965 को 'रिंग ऑफ फायर' देखा गया था।
सूर्यग्रहण सबसे पहले तमिलनाडु के कन्याकुमारी में सुबह 11.06 बजे दिखा। सूर्यग्रहण के प्रभावों का अध्ययन करने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो)ने पांच रॉकेटों का प्रक्षेपण भी किया जबकि हरिद्वार सहित देश के तमाम धार्मिक स्थलों में मंदिरों के कपाट बंद रहे,जो ग्रहण के खत्म होने के बाद खुल गए।
सहस्राब्दी का सबसे लंबा सूर्यग्रहण कुंडलाकार था। दिल्ली में आंशिक सूर्य ग्रहण ही दिखा लेकिन इस दिव्य नजारे को देखने के लिए लोगों के उत्साह में कोई कमी नहीं थी। यहां सुबह 11.53 बजे से दोपहर बाद 3.11 बजे तक इसे देखा गया। दोपहर 1.39 बजे सबसे अधिक 53 प्रतिशत तक सूर्य ग्रहण देखा गया। नेहरू तारा मंडल में और एमेच्योर एस्ट्रोनॉमर्स एसोसिएशन ने लोगों को यह अनोखा नजारा दिखाने की व्यवस्था की थी।
उत्तर प्रदेश के वैज्ञानिक संस्थानों और विद्यालयों में लोगों को सूर्यग्रहण का नजारा दिखाने के लिए विशेष प्रबंध किए गए थे। लखनऊ स्थित इंदिरा गांधी नक्षत्रशाला में सूर्यग्रहण दिखाने के लिए विशेष व्यवस्था की गई थी। बादलों की वजह से शुरूआत में लोगों थोड़ी निराशा हाथ लगी। हालांकि दोपहर बाद लोगों ने कुदरत के इन अनोखे नजारे को देखा।
इंदिरा गांधी नक्षत्रशाला के प्रमुख अनिल यादव ने आईएएनएस को बताया कि वैसे तो लखनऊ में सूर्यग्रहण की शुरुआत सुबह 11.57 पर होनी थी लेकिन बादल छाए रहने के कारण यह दोपहर एक बजे देखा जा सका। लखनऊ में इसे 52 प्रतिशत देखा गया। दोपहर करीब 1.45 मिनट पर सूर्यग्रहण अपने चरम पर पहुंचा और अपराह्न् 3.18 मिनट पर समाप्त हुआ। बलिया में सर्वाधिक 70 प्रतिशत सूर्यग्रहण देखा गया जबकि बरेली, शाहजहांपुर, हरदोई, रामपुर और मुरादाबाद में इसे 45 प्रतिशत देखा गया।
मध्य प्रदेश में भोपाल और उज्जैन में लोगों को सूर्यग्रहण का नजारा दिखाने के लिए विशेष इंतजाम किए गए थे। भोपाल में क्षेत्रीय विज्ञान केंद्र ने टेलीस्कोप के जरिए इस खगोलीय घटना को दिखाने का इंतजाम किया था। इसी तरह उज्जैन की जीवाजी वेधशाला में भी विशेष इंतजाम किए गए थे। वहां देश के अलग-अलग स्थानों से पहुंचे खगोल विशेषज्ञों ने इस ग्रहण का खगोलीय विश्लेषण किया।
हिमाचल प्रदेश में यह अद्भुत नजारा देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग ऐतिहासिक रिज इलाके में इकट्ठा हुए। हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद के प्रधान वैज्ञानिक अधिकारी कामराज कैस्थ ने कहा कि ऐतिहासिक रिज इलाके में बड़ी संख्या में लोग सूर्यग्रहण का नजारा देखने के लिए इकट्ठा हुए थे। उड़ीसा, बिहार, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश में भी लोगों ने सूर्यग्रहण का नजारा देखा।
उल्लेखनीय है कि कुंडलाकार सूर्य ग्रहण तब होता है जब सूर्य और चंद्रमा एक सीधी रेखा में होते हैं लेकिन चंद्रमा की छाया सूर्य की परिधि की अपेक्षा छोटी होती है। इस प्रकार चंद्रमा से ढंका हुआ सूर्य 'वलयाकार' के रूप में नजर आता है और चंद्रमा की छाया के चारों ओर से सूर्य की किरणें निकलती हुई दिखाई देती हैं।
सूर्य ग्रहण के प्रभावों के अध्ययन के लिए इसरो, आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा और केरल के थुंबा स्थित केंद्रों से रॉकेटों की एक श्रेणी प्रक्षेपित की गई। ये रॉकेट अपने साथ कुछ यंत्र लेकर गए जो ऊपरी वायुमंडल में भौतिक परिवर्तनों का मापन करेंगे। इसरो के परियोजना निदेशक पी.रत्नाकर रॉव ने आईएएनएस को बताया कि शुक्रवार को दोपहर एक बजे से लेकर तीन बजे तक पांच रॉकेट प्रक्षेपित किए गए।
इन रॉकेटों से सूर्य ग्रहण से जुड़े विभिन्न वायुमंडलीय और आयनमंडलीय मानकों का मापन किया जाएगा। थुंबा इक्वाटोरियल रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र (टीईआरएलएस) से रोहिणी रॉकेट का प्रक्षेपण किया गया। इसरो रोहिणी रॉकेट (आरएच 560 एमके 2) को श्रीहरिकोटा से प्रक्षेपित किया गया। शनिवार को भी दोपहर एक से दो बजे के बीच रॉकेट का प्रक्षेपण किया जाएगा।
उधर, हरिद्वार में शुक्रवार को सूर्यग्रहण के दौरान सभी मंदिरों के द्वार बंद रखे गए थे। हरिद्वार के स्थानीय पुजारियों के अनुसार ऐसा सूर्यग्रहण के प्रतिकूल प्रभावों के मद्देनजर किया गया था। इसके अलावा भी देश के अलग-अलग हिस्सों में मंदिरों के कपाट बंद रखे गए थे। ग्रहण के दौरान देश भर में लोगों ने पवित्र नदियों में डुबकी भी लगाई।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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