त्रिपुरा में 75 विद्रोहियों का समर्पण

त्रिपुरा में 75 विद्रोहियों का समर्पण

सुबीर भौमिक

बीबीसी संवाददाता, कोलकाता

त्रिपुरा में अधिकारियों के अनुसार दो विद्रोही गुटों से संबंध रखने वाले लगभग 75 विद्रोहियों ने समर्पण कर दिया है.

अधिकारियों के अनुसार इन विद्रोहियों पर पिछले वर्ष के अंत से बांग्लादेशी सुरक्षा बलों ने काफ़ी दबाव बना रखा था.

उन्होंने बताया कि इसके अतिरिक्त कई विद्रोहियों को तब गिरफ़्तार भी किया गया जब वे बांग्लादेश से भाग कर त्रिपुरा पहुँचे.

त्रिपुरा में सक्रिय रहनेवाले दो विद्रोही गुटों 'नेशनल लिबरेशन फ़्रंट ऑफ़ त्रिपुरा' और 'ऑल त्रिपुरा टाइगर फ़ोर्स' अपने लोगों के बांग्लादेश से भागकर त्रिपुरा में समर्पण करने के कारण बुरी तरह प्रभावित हुए हैं.

पिछले हफ़्ते एनएलएफ़टी के आठ सशस्त्र विद्रोहियों को अर्धसैनिक बल असम राइफ़ल्स के जवानों ने त्रिपुरा के कंचनपुरा इलाक़े से गिरफ़्तार किया था.

असम राइफ़ल्स के प्रवक्ता दिनेश ठाकुर ने बताया कि इन विद्रोहियों के पास से भारी मात्रा में हथियार बरामद हुए हैं जिनमें अमरीका में बने रिवॉल्वर और कार्बाइन भी शामिल हैं.

उन्होंने बताया कि ये विद्रोही जब बांग्लादेश के चटगाँव की पहाड़ियों में अपने ठिकानों से भाग कर त्रिपुरा में आने की कोशिश कर रहे थे तब उन्हें गिरफ़्तार किया गया.

खलबली

त्रिपुरा के खुफ़िया पुलिस प्रमुख के सलीम अली ने बीबीसी को बताया, "बांग्लादेश में उत्तर पूर्वी भारत के विद्रोही नेताओं की गिरफ़्तारी से वहाँ रहने वाले अलगवादी नेताओं में खलबली मच गई है. अब वे बड़ी संख्या में वहाँ से भाग रहे हैं."

समर्पण करने वालों में एनएलएफ़टी के पूर्व सेना प्रमुख विद्या सिंह जामातिया भी शामिल हैं.

हालाँकि पुलिस अधिकारी इस बात से चकित हैं कि समर्पण करने वाले विद्रोहियों ने हथियारों के साथ समर्पण क्यों नहीं किया.

के सलीम अली ने बताया, "बहुत कम विद्रोहियों ने हथियारों के साथ समर्पण किया है. ये चिंता की बात है."

अली ने कहा कि हालांकि भारी संख्या में विद्रोही अपने ठिकानों को छोड़ कर भाग रहे हैं लेकिन घने जंगल वाले चटगाँव इलाक़ों में उनके ठिकानों पर अभी तक कोई हमला नहीं हुआ है.

कसती नकेल

पिछले महीने भी ढाका पुलिस के डिटेक्टिव ब्रांच के लोगों ने एक घर पर छापा मारा था जहाँ बताया गया कि एनएलएफ़टी प्रमुख बिस्वमोहन देबबर्मा छिपे थे.

मगर सूचना पक्की नहीं निकली और वहाँ देबबर्मा का अंगरक्षक मिला.

बताया जा रहा है कि इस घटना के बाद गिरफ़्तारी से बचने के लिए बिस्वमोहन देबबर्मा तत्काल दक्षिण पूर्व एशिया की ओर भाग गए.

इससे पहले नवंबर में भी बांग्लादेशी अधिकारियों ने इसी तरह की एक कार्रवाई के तहत एक और विद्रोही संगठन कामतापुर लिबरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन - केएलओ - के नेता जिबोन सिंघ को पकड़ने के लिए जाल बिछाया था लेकिन अंततः उनके हाथ उनसे नीचे का उनका सहयोगी तपन पटवारी लगा.

बांग्लादेशी अधिकारियों ने बीबीसी को नाम न बताने की शर्त पर जानकारी दी है कि तपन पटवारी ही उन्हें असम के विद्रोही संगठन युनाईटेड लिबरेशन फ़्रंट ऑफ़ असम के नेताओं से मिलवाने ले गया था जिनमें उनके चेयरमैन अरबिन्द राजखोवा भी शामिल थे और बाद में इन सबको भारतीय अधिकारियों के हवाले कर दिया गया.

इन गिरफ़्तारियों के बाद से बांग्लादेश में गढ़ बनाकर पिछले लगभग दो दशक से गतिविधियाँ चलानेवाले पूर्वोत्तर भारत के अधिकतर विद्रोही गुटों की कमर टूट गई है.

इनमें भी सबसे अधिक प्रभाव त्रिपुरा के चरमपंथियों पर पड़ा जहाँ एक साथ लगभग 75 विद्रोहियों ने समर्पण किया है.

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