शिबू सोरेन-भ्रष्टाचार और हत्या के आरोपों के बावजूद लोकप्रिय नेता
रांची, 30 दिसम्बर (आईएएनएस)। शिबू सोरेन को गरीबों के मसीहा के रूप में जाना जाता है और रिश्वत के आरोपों के बावजूद वह बहुत लोकप्रिय राजनेता हैं। बुधवार को तीसरी बार झारखण्ड के मुख्यमंत्री बने सोरेन प्रदेश में शीर्ष पद हासिल करने के कुछ दिन बाद ही हत्या के दो मामलों का भी सामना करेंगे।
'गुरुजी' के नाम से प्रसिद्ध झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (झामुमो)के अध्यक्ष ने गरीब और जनजातीय समुदाय को प्रताड़ित करने वाले साहूकारों से बरसों तक लड़ाई लड़ने के बाद राजनीति में कदम रखा था।
हजारीबाग जिले के निमरा गांव (यद्यपि उनका गांव अब रामगढ़ जिले है) में 11 जनवरी 1944 को सोरेन का जन्म हुआ था। सोरेन ने कथित तौर पर साहूकारों के आदमियों के द्वारा अपने पिता की हत्या किए जाने के बाद पढ़ाई अधूरी छोड़ दी।
इस घटना के बाद वह साहूकारों के आजीवन दुश्मन बन गए थे। 18 वर्ष की आयु में उन्होंने 'संथाल नवयुवक संघ' की स्थापना की।
उन्होंने वर्ष 1960 के अंत में धनबाद जिले के टुंडी ब्लॉक में एक आश्रम स्थापित किया। वह जरूरतमंदों को अधिक ब्याज पर पैसा देने वालों के लिए आतंक का पर्याय बन गए। वह गरीबों के मुद्दे उठाते थे। जल्दी वह बाहरी लोगों-गैर जनजातीय लोगों के विरोधी हो गए।
जनजातीय समुदाय के लोगों ने जामताड़ा जिले के चिरुडीह गांव में 11 गैर जनजातीय लोगों की हत्या कर दी। इस मामले में सोरेन का आरोपी बनाया गया था लेकिन जामताड़ा जिला अदालत ने उन्हें बरी कर दिया।
इस घटना के बाद से जनजातीय समाज में उन्हें भगवान माना जाने लगा। हत्या के मामले ने सोरेन को भूमिगत रहने के लिए मजबूर किया लेकिन लंबे समय तक ऐसा नहीं हुआ।
1971 में सोरेन झामुमो के महासचिव बने। 1980 में वह लोकसभा के लिए निवार्चित हुए। 1986 में वह झामुमो के अध्यक्ष बने। उन्होंने 1989,1991, 1996, 2004 और 2009 में दुमका लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।
उन पर वर्ष 1992 में पी. वी. नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार के पक्ष में मतदान करने के लिए लोकसभा के तीन अन्य सांसदों के साथ रिश्वत लेने का आरोप लगा। रिश्वत मामले में उन्हें जेल की सजा हुई।
वर्ष 2004 में वह मनमोहन सिंह की सरकार में कोयला मंत्री बने। चिरुडीह नरसंहार मामले में उनके खिलाफ वारंट जारी होने के बाद जुलाई 2004 में उन पर मंत्रिमंडल छोड़ने का दबाव बनाया गया।
अक्टूबर 2004 में वह फिर केंद्र सरकार में मंत्री बने। मार्च 2005 में झारखण्ड के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया लेकिन वह विधानसभा में अपना बहुमत साबित करने में विफल रहे।
वर्ष 2006 में उन्हें एक बार फिर केंद्रीय मंत्रीमंडल में शामिल किया गया। अपने निजी सचिव शशिनाथ झा की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा मिलने के बाद उन्हें अक्टूबर में मंत्रिमंडल छोड़ना पड़ा।
उन्होंने अदालत के इस फैसले के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील की और 2007 में उन्हें बरी कर दिया गया। उन्हें चिरुडीह नरसंहार मामले में भी बरी कर दिया गया। 27 अगस्त 2008 को वह दूसरी बार मुख्यमंत्री बने लेकिन इस साल जनवरी में तमाड़ विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में हार का सामना करने के बाद पद गंवाना पड़ा।
सोरेन के खिलाफ अब भी हत्या के दो मामले हैं। इनमें से तीन लोगों की हत्या के एक मामले में चार जनवरी को गिरडीह जिला अदालत में सुनवाई होगी।
सुप्रीम कोर्ट आठ मार्च को शशिनाथ झा हत्या मामले में सोरेन को बरी किए जाने के खिलाफ दायर एक याचिका पर सुनवाई करेगा।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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