कोपेनहेगन में अभी तक कोई सफलता नहीं (राउंडअप)
उधर डेनमार्क पुलिस ने मंगलवार को कहा कि उन्होंने कोपेनहेगन में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों के समूह के खिलाफ रातभर आंसू गैस का इस्तेमाल किया और करीब 200 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया।
कोपेहनहेगन सम्मेलन में ताजा स्थिति के अनुसार यहां जमा हुए 100 से अधिक पर्यावरण मंत्रियों ने सम्मेलन को विफल होने से बचा लिया है। छोटे द्वीपीय देशों के गठबंधन (एओएसआईएस) ने उनकी चिंताओं को दूर नहीं किए जाने को लेकर एक बार फिर बातचीत से बाहर होना चाहा। पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने आईएएनएस को बताया कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं ने दिन में सम्मेलन को विफल होने से बचा लिया।
रात को सरकारी प्रतिनिधियों के बीच बंद कमरे में चली बातचीत के दौरान सम्मेलन की विफलता की एक प्रबल आशंका दिखाई दी थी, क्योंकि धनी देश अपने रुख से चिपके रहे कि वे जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए तब तक कुछ नहीं करेंगे, जब तक उभरती अर्थव्यवस्थाएं अपनी कार्रवाई के अंतर्राष्ट्रीय निरीक्षण के लिए राजी नहीं हो जातीं।
बैठक में उपस्थित रहे एक प्रतिनिधि के अनुसार चीन, भारत और दक्षिण अफ्रीका ने इसे एक बार फिर खारिज कर दिया। प्रतिनिधि ने बताया कि अफ्रीकी देशों के समूह और छोटे द्वीपीय देशों के गठबंधन (एओएसआईएस) ने एक बार फिर बातचीत से बाहर होना चाहा, क्योंकि उनकी चिंताओं को दूर नहीं किया जा रहा था।
प्रतिनिधियों ने कहा कि भारत और चीन, ब्राजील व दक्षिण अफ्रीका के पर्यावरण मंत्रियों ने अन्य विकासशील देशों के समूहों के साथ एक अलग से बैठक की और उन्हें सम्मेलन में बने रहने तथा बातचीत में हिस्सा लेने को राजी किया।
फिर भी बातचीत लगातार उलटी दिशा की ओर बढ़ती रही। रात को छह नए समझौतों के मसौदे पेश किए गए। यदि उन सभी मसौदों पर विचार करना हो तो इसके लिए महीनों तक बैठक करनी होगी।
अभी तक की स्थिति यह है कि पिछले महीने बीजिंग में ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन द्वारा तैयार किए गए बीएएसआईसी मसौदे के ही कोपेनहेगन समझौते के रूप में घोषित किए जाने की अधिकतम संभावना है।
उधर डेनमार्क पुलिस का कहना है कि ज्यादातर प्रदर्शनकारियों को बाद में रिहा कर दिया गया था लेकिन पांच लोग अब भी हिरासत में हैं और उन पर एक पुलिस अधिकारी पर हमला करने के आरोप तय किए जा सकते हैं।
प्रदर्शनकारियों द्वारा शहर के एक स्वतंत्र व स्वायत्त क्षेत्र क्रिस्टिएनिया के सामने की बाड़ में आग लगा देने पर पुलिस ने हस्तक्षेप किया। क्रिस्टिएनिया एक पूर्व सैन्य केंद्र है, जो 1970 के दशक के बाद से डेनमार्क की राजधानी में वैकल्पिक आंदोलन का एक ठिकाना रहा है।
संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन से पहले डेनमार्क ने एक विशेष कानून बनाया है, जो पुलिस को संदिग्धों को बिना किसी आरोप के 12 घंटे तक हिरासत में रखने की अनुमति देता है।
पुलिस ने शनिवार से अब तक जलवायु परिवर्तन सम्मेलन का विरोध कर रहे करीब 1,300 प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया है। उनमें से ज्यादातर को रिहा कर दिया गया है।
पटरी से उतर रहा है कोपेनहेगन सम्मेलन :
गैर सरकारी संगठनों ने मंगलवार को कहा है कि धनी देशों के कारण जलवायु परिवर्तन पर चल रहा शिखर सम्मेलन पटरी से उतर रहा है। एक्शनएड के रमन मेहता ने कहा कि औद्योगीकृत देशों द्वारा उठाए जा रहे प्रक्रियागत मुद्दों पर बातचीत रुकी पड़ी है।
450 से अधिक गैर सरकारी संगठनों की प्रतिनिधि संस्था, क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क (सीएएन) द्वारा आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में मेहता ने कहा, "उभरती अर्थव्यवस्थाओं ने अपने प्रस्ताव पेश कर दिए हैं, लेकिन धनी देशों ने उन पर कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की है।"
मेहता भारत, चीन, ब्राजील, इंडोनेशिया और मेक्सिको द्वारा घोषित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्यों का जिक्र कर रहे थे।
जलवायु परिवर्तन पर समझौते में खलल डाल रहे हैं धनी राष्ट्र :
कोपेनहेगन में समझौते की दिशा में प्रगति न हो पाने के लिए धनी देश भारत और चीन को दोषी ठहरा रहे हैं, जबकि इसके लिए सिर्फ उन्हीं को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। यह बात एक अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्था डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कही।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की जलवायु नीति के प्रमुख किम कार्सटेंसन ने कहा, "धनी देशों में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने की इच्छा का अभाव विनाशकारी है।"
उन्होंने कहा, "मुझे अभी भी उम्मीद है कि वे प्रतिबद्धताओं में कुछ वृद्धि करेंगे। मसलन यूरोपीय संघ ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 20 प्रतिशत की कटौती की जगह 30 प्रतिशत कटौती करने की प्रतिबद्धता जाहिर कर सकता है।"
कार्सटेंसन ने कहा, "मुझे यह भी उम्मीद है कि जापान को हम उसके द्वारा व्यक्त की गई प्रतिबद्धता पर अडिग रहने के लिए कह सकते हैं। रूस घोषित 25 प्रतिशत कटौती में कुछ वृद्धि कर सकता है। हम यही उम्मीद कर रहे हैं।"
उन्होंने इस बात पर अप्रसन्नता जाहिर की कि धनी देश गरीब देशों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में सहयोग देने के लिए आर्थिक सहायता नहीं दे रहे हैं, जबकि जलवायु परिवर्तन की वजह धनी देश ही हैं।
कार्सटेंसन ने कहा कि उन्होंने अगले तीन साल तक सालाना 10 अरब डॉलर की राशि देने का वादा किया है, जबकि विश्व बैंक द्वारा किए गए सर्वेक्षण के अनुसर विकासशील देशों की जरूरत 75 अरब डॉलर सालाना है।
यह पूछने पर कि धनी देश वित्तीय प्रतिबद्धताओं से पीछे क्यों हट रहे हैं, उन्होंने कहा, "वे लोग आशंकित हैं, क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्थाएं बुरी हालत में हैं। उन्हें विकासशील देशों की जरूरत के लिए आसानी से धन नहीं मिल रहा है। वे इन आंकड़ों से डर रहे हैं, खासतौर पर तब जब उनका बजट घाटा बहुत अधिक है।"
उन्होंने कहा, "इसके अलावा इन देशों के अपने निहित स्वार्थ भी हैं, इसके बावजूद हमें सार्थक आंकड़े मिलने के आसार हैं।"
ग्रीन प्रौद्योगिकियों के हस्तातंरण के मसले पर डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के प्रमुख संतुष्ट दिखे। इस उद्देश्य के लिए क्षेत्रीय केंद्रों की स्थापना का भारत का विचार सम्मेलन में सरकारों ने मंजूर कर लिया। कार्सटेंसन ने कहा कि हमें देखना होगा कि क्या वे इनसे पेटेंट खरीद भी पाएंगे या नहीं।
कोपेनहेगन सम्मेलन में कानूनी तौर पर बाध्यकारी किसी नतीजे तक नहीं पहुंचने की संभावना के बारे में पूछने पर कार्सटेंसन ने कहा, "समझौता होना बेहद जरूरी है। हमें इन स्पष्टताओं के साथ विशिष्ट प्रतिबद्धताओं की जरूरत है कि कौन क्या करने वाला है।"
उन्होंने कहा कि इस समय करीब 120 देशों के प्रमुख यहां जुटने वाले हैं, ऐसा मौका शायद दोबारा न आए। उन्होंने कहा कि इस मौके का लाभ उठाया जाना चाहिए।
यह पूछने पर कि क्या वह देशों के इस पक्ष से सहमत हैं कि भारत और चीन मौजूदा सत्र में बाधक बन रहे हैं, कार्सटेंसन ने इससे असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि इन देशों को याद रखना चाहिए कम से कम उन दोनों ने अपनी प्रतिबद्धताएं व्यक्त कर दी हैं, जैसा कि धनी देशों ने अब तक नहीं किया है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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