'जलवायु परिवर्तन पर समझौते में खलल डाल रहे हैं धनी राष्ट्र'
जयदीप गुप्ता
कोपेनहेगन, 15 दिसम्बर (आईएएनएस)। कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन के मसले पर जारी संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में किसी समझौते की दिशा में प्रगति न हो पाने के लिए धनी देश भारत और चीन को दोषी ठहरा रहे हैं, जबकि इसके लिए सिर्फ उन्हीं को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। यह बात एक अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्था डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कही।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की जलवायु नीति के प्रमुख किम कार्सटेंसन ने कहा, "धनी देशों में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने की इच्छा का अभाव विनाशकारी है।"
उन्होंने कहा, "मुझे अभी भी उम्मीद है कि वे प्रतिबद्धताओं में कुछ वृद्धि करेंगे। मसलन यूरोपीय संघ ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 20 प्रतिशत की कटौती की जगह 30 प्रतिशत कटौती करने की प्रतिबद्धता जाहिर कर सकता है।"
कार्सटेंसन ने कहा, "मुझे यह भी उम्मीद है कि जापान को हम उसके द्वारा व्यक्त की गई प्रतिबद्धता पर अडिग रहने के लिए कह सकते हैं। रूस घोषित 25 प्रतिशत कटौती में कुछ वृद्धि कर सकता है। हम यही उम्मीद कर रहे हैं।"
उन्होंने इस बात पर अप्रसन्नता जाहिर की कि धनी देश गरीब देशों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में सहयोग देने के लिए आर्थिक सहायता नहीं दे रहे हैं, जबकि जलवायु परिवर्तन की वजह धनी देश ही हैं।
कार्सटेंसन ने कहा कि उन्होंने अगले तीन साल तक सालाना 10 अरब डॉलर की राशि देने का वादा किया है, जबकि विश्व बैंक द्वारा किए गए सर्वेक्षण के अनुसर विकासशील देशों की जरूरत 75 अरब डॉलर सालाना है।
यह पूछने पर कि धनी देश वित्तीय प्रतिबद्धताओं से पीछे क्यों हट रहे हैं, उन्होंने कहा, "वे लोग आशंकित हैं, क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्थाएं बुरी हालत में हैं। उन्हें विकासशील देशों की जरूरत के लिए आसानी से धन नहीं मिल रहा है। वे इन आंकड़ों से डर रहे हैं, खासतौर पर तब जब उनका बजट घाटा बहुत अधिक है।"
उन्होंने कहा, "इसके अलावा इन देशों के अपने निहित स्वार्थ भी हैं, इसके बावजूद हमें सार्थक आंकड़े मिलने के आसार हैं।"
ग्रीन प्रौद्योगिकियों के हस्तातंरण के मसले पर डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के प्रमुख संतुष्ट दिखे। इस उद्देश्य के लिए क्षेत्रीय केंद्रों की स्थापना का भारत का विचार सम्मेलन में सरकारों ने मंजूर कर लिया। कार्सटेंसन ने कहा कि हमें देखना होगा कि क्या वे इनसे पेटेंट खरीद भी पाएंगे या नहीं।
कोपेनहेगन सम्मेलन में कानूनी तौर पर बाध्यकारी किसी नतीजे तक नहीं पहुंचने की संभावना के बारे में पूछने पर कार्सटेंसन ने कहा, "समझौता होना बेहद जरूरी है। हमें इन स्पष्टताओं के साथ विशिष्ट प्रतिबद्धताओं की जरूरत है कि कौन क्या करने वाला है।"
उन्होंने कहा कि इस समय करीब 120 देशों के प्रमुख यहां जुटने वाले हैं, ऐसा मौका शायद दोबारा न आए। उन्होंने कहा कि इस मौके का लाभ उठाया जाना चाहिए।
यह पूछने पर कि क्या वह देशों के इस पक्ष से सहमत हैं कि भारत और चीन मौजूदा सत्र में बाधक बन रहे हैं, कार्सटेंसन ने इससे असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि इन देशों को याद रखना चाहिए कम से कम उन दोनों ने अपनी प्रतिबद्धताएं व्यक्त कर दी हैं, जैसा कि धनी देशों ने अब तक नहीं किया है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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