गुजरात में पतंगबाजी को वर्जना के दायरे से मुक्ति दिलाई थी रेडियो ने
अतीत का गवाह रहे बुजुर्ग बताते हैं कि राज्य के मेहसाना, पाटन, सबरकांठा और बनासकांठा जैसे जिलों में पतंगबाजी का शौक युवाओं पर पूरी तरह हावी हुआ करता था, पर तब के अभिभावक और बुजुर्ग इस शौक को निकम्मों का खेल माना करते थे। यही वजह है कि उन्हें घर की बालकनी या छत से पतंग उड़ाने की इजाजत नहीं मिलती थी।
मेहसाना जिले के विसनगर इलाके में रहने वाले 80 वर्षीय पूर्व उप जिलाधिकारी मनसुखभाई परमार कहते हैं, "ध्वस्त किलों की जगह बने वॉच टावर पर चढ़कर लोग पतंगबाजी करते थे। उन्हें घर की छत से ऐसा करने की इजाजत नहीं दी जाती थी। मध्यवर्गीय परिवारों के मुखिया पतंगबाजी पसंद नहीं करते थे। इसे अनुशासहीनता और निकम्मेपन का प्रतीक माना जाता था। इसे पैसे और समय की बर्बादी माना जाता था।"
उन दिनों आगरा से पतंगें मंगाई जाती थीं। तीन दशक पहले ऑल इंडिया रेडियो ने इस पर आंखों देखी कमेंटरी पेश कर इससे जुड़ी वर्जना खत्म कर दी। फिर तो लोग कानों से रेडियो चिपकाकर इस कमेंटरी का लुत्फ लेने लगे। एक बुजुर्ग ए़ के. पटेल कहते हैं, "लोगों को इसमें मजा आने लगा और बुजुर्गो की धारणा बदल गई।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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