'चमकते भारत' और 'पीड़ित भारत' के बीच इस वर्ष अंतर और बढ़ा : माकपा
माकपा के साप्ताहिक मुखपत्र 'लोकलहर' के ताजा अंक में कहा गया है कि एक तरफ अरबपतियों की बढ़ती संख्या है तो दूसरी ओर भारत की आबादी का करीब 80 फीसदी हिस्सा जो 20 रुपये प्रतिदिन से भी कम आमदनी में अपना जीवन बिता रहा है।
पार्टी के अनुसार वर्ष 2008 पूरी दुनिया और भारत दोनों के लिए काफी कठिन साल रहा। इसी साल 1930 के दशक की भयानक आर्थिक मंदी के बाद वैश्विक पूंजीवाद का सबसे बदतरीन संकट सामने आया है। इससे दुनिया भर में लाखों लोगों का जीवन तबाह हो गया।
माकपा के अनुसार इस संकट से एक बार फिर यह साफहो गया कि पूंजीवाद इंसान के शोषण पर आधारित व्यवस्था है और यह कभी भी संकटमुक्त नहीं हो सकती है।
पार्टी ने कहा कि किसानों की आत्महत्याएं अभी भी जारी हैं। वर्ष 2008 के आंकड़े अभी भले ही उपलब्ध नहीं हैं लेकिन 2007 में 16,632 किसानों ने आत्महत्या की थी। इसके अनुसार प्रतिदिन 46 किसान और हर घंटे चार किसान आत्महत्या कर रहे हैं।
यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार पांच साल से कम उम्र के 58 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। हर रोज करीब 1000 बच्चे ऐसी सामान्य बीमारियों के चलते मौत की नींद में चले जाते हैं, जिन पर आसानी से काबू पाया जा सकता है।
माकपा ने कहा कि इस स्थिति को जारी रहने नहीं दिया जा सकता है। इसके लिए ऐसी नीतियों को लागू किए जाने की आवश्यकता है जो भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस की नव उदारवादी नीतियों से भिन्न हों।
पार्टी ने उम्मीद जताई कि वर्ष 2009 में होने वाले संसदीय चुनाव में भाजपा की सांप्रदायिक और कांग्रेस की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ मजबूत वैकल्पिक गठबंधन तैयार होगा। आने वाला साल भारत की जनता को बेहतर जीवन की ओर ले जाने वाला प्रस्थान बिंदु सिद्ध हो सकता है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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