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    उड़ीसा व कर्नाटक की सरकारें रोक सकती थीं हिंसा : अल्पसंख्यक आयोग

    By Staff
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    नई दिल्ली, 7 अक्टूबर (आईएएनएस)। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष मोहम्मद शफी कुरैशी का मानना है कि उड़ीसा और कर्नाटक की सरकारों ने समय रहते ऐहतियाती कदम उठाए होते तो दोनों सूबों में जान-माल के नुकसान को रोका जा सकता था लेकिन दोनो सरकारें ऐसा करने में विफल रही।

    नई दिल्ली, 7 अक्टूबर (आईएएनएस)। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष मोहम्मद शफी कुरैशी का मानना है कि उड़ीसा और कर्नाटक की सरकारों ने समय रहते ऐहतियाती कदम उठाए होते तो दोनों सूबों में जान-माल के नुकसान को रोका जा सकता था लेकिन दोनो सरकारें ऐसा करने में विफल रही।

    उड़ीसा व कर्नाटक में ईसाइयों के खिलाफ जारी हिंसा और गिरजाघरों पर हो रहे हमलों पर अपनी चिंता जताते हुए कुरैशी ने आईएएनएस से एक खास बातचीत में कहा, "दोनों राज्य सरकारों को कानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए जो कदम उठाने चाहिए थे, वह उन्होंने नहीं उठाए। सरकार ऐहतियाती कदम उठा सकती थी, लेकिन उसने नहीं उठाए। इस प्रकार की घटनाएं बढें़ नहीं, यह तो सरकार के हाथों में है। इसमें भी काफी ढील हुई। राज्य सरकारों ने बलवा करने वालों को खुली छूट दे दी। परिणामस्वरूप वहां जान-माल का काफी नुकसान हुआ।"

    कुरैशी ने कहा, "मैंने उड़ीसा सरकार से राज्य में हुई हिंसा के बारे में रिपोर्ट मंगवाई तो सरकार ने अर्धसैनिकों बलों की कमी का रोना रोया। फिर इस मुद्दे पर मैंने गृह मंत्री से मुलाकात की। गृह मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार को जितनी मदद चाहिए, केंद्र देने को तैयार है। राज्य सरकार मांगे तो केंद्र हेलिकाप्टर भी देने को तैयार हैं। जितना पुलिस बल मांगा गया था केंद्र ने दिया है।"

    धर्मातरण के सवाल पर कुरैशी ने कहा, "धर्मातरण हो रहा है। जाहिरा तौर पर इसके खिलाफ लोगों में गुस्सा है। स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या के बाद उड़ीसा के हालात और खराब हुए हैं। सबसे ज्यादा नुकसान ईसाइयों का हुआ है। उनकी संपत्तियों और गिरिजाघरों को नुकसान पहुंचाया गया है। यह आग फिर कर्नाटक, मध्यप्रदेश और अन्य राज्यों में फैल गई।"

    कुरैशी ने हालांकि भारी पैमाने पर बलपूर्वक धर्मांतरण की बात को गलत बताया और कहा, "सबूत नहीं है इसके। इक्का दुक्का मामले जरूर हैं। हमने जब उड़ीसा सरकार से पूछा कि आपके पास धर्मांतरण की कितनी शिकायतें आई हैं, तो उन्होंने बताया कि इस संबंध में मुश्किल से दो या तीन शिकायतें ही आई हैं।"

    एक सवाल के जवाब में कुरैशी ने बताया, "आयोग ने अपने दो प्रतिनिधिमंडल उड़ीसा भेजे। एक पहले और एक हाल में। वहां से जो रिपोर्ट आई है, उसे देखकर मुझे लग रहा है कि राज्य सरकार को कानून व्यवस्था बहाल करने के लिए जो कदम उठाने चाहिए थे, वह उसने नहीं उठाए।"

    आतंकवादी घटनाओं में अल्पसंख्यकों की भूमिका को लेकर उठ रहे सवालों पर उन्होंने कहा, "आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता। इसलिए किसी खास फिरके को इससे जोड़ना ठीक बात नहीं है। आतंकवाद को किसी कौम से जोड़ना गलत है।"

    उन्होंने कहा, "मैं किसी का बचाव नहीं कर रहा हूं। लेकिन मेरा कहना है कि बाकायदा तहकीकात के बाद यदि किसी की भूमिका साबित होती है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन शक की ऊंगली खास कौम पर ही उठाना ठीक नहीं है।"

    नानावती आयोग द्वारा गोधरा और उसके बाद गुजरात में फैली साम्प्रदायिक हिंसा के मामले में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को क्लीन चिट दिए जाने के बारे में कुरैशी ने कहा, "मुझे तो कुछ समझ में नहीं आया कि क्लीन चिट कैसे दे दी गई उन्हें। इससे शक पैदा होता है। जांच आयोगों की साख खत्म होती है। बनर्जी आयोग ने बाकायदा जांच की। उसने अपनी रिपोर्ट दी। उस रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों को उल्टा करने के लिए नानावती आयोग बिठाया गया। साफ जाहिर है कि बनर्जी रिपोर्ट को खारिज करने के लिए नानावती आयोग की रिपोर्ट लिखवाई गई है। यह सब सुनियोजित तरीके से किया गया है।"

    इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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