OI Exclusive: बिहार में ये ‘टॉयलेट क्लिनिक’ क्या है, जिससे बदल गई पूरे गांव की तस्वीर? कहानी मुखिया बबीता की
OI Exclusive: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारियां तेज हो गई हैं। चुनाव की तारीखों की घोषणा किसी भी समय की जा सकती है। फिलहाल बिहार की मतदाता सूची को लेकर संसद तक में हंगामा हो रहा है। बिहार में बह रही चुनावी बयार के बीच महिला मुखिया (सरपंच) बबीता कुमारी के बारे में भी जरूर जानना चाहिए, जो वोटरों की जरूरतों को बिना कहे समझा और उनके समाधान के लिए कार्य किया।
टॉयलेट क्लिनिक योजना से ग्राम पंचायत की स्वच्छता व्यवस्था में बड़ा सुधार आया। बबीता कुमारी बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बिशनपुर बघनगरी ग्राम पंचायत की मुखिया हैं।

कोरोना काल में दिल्ली से गांव लौटने के बाद बबीता कुमारी का गांव से जुड़ाव देख ग्रामीणों ने उनको पंचायती राज चुनाव के मैदान में उतारा और प्रतिद्वंदी अर्चना कुमारी के सामने 16 सौ वोटों से जीत भी दिला दी। मुखिया बनने के बाद बबीता कुमारी ने जो कार्य किए, वे आज अन्य पंचायतों के लिए मिसाल बन गए हैं।
मुखिया बबीता कुमारी का साक्षात्कार
वनइंडिया हिंदी से खास बातचीत में बबीता कुमारी ने कोरोना से जंग, गांव वापसी, सरपंच चुनाव में जीत, सरकारी जमीन को अतिक्रमण मुक्त करवाना और टॉयलेट क्लिनिक मुहिम के बारे में विस्तार से बताया। जानिए सफलता की पूरी कहानी खुद बबीता कुमारी की जुबानी।
बबीता कुमारी ने बताया कि ''मार्च 2023 की एक सुबह करीब पांच बजे रोजाना की तरह मैं मॉनिंग वॉक पर थी। अपने वार्ड पांच से निकलकर वार्ड एक की तरफ जा रही थी। इसी दौरान वार्ड की समस्याओं पर भी ध्यान दे रही थी। रास्ते में मुझे पूनम देवी और रोजी मिश्रा मिलीं। दोनों खुले में शौच के लिए जा रही थीं। मुझे थोड़ा अजीब लगा कि आजकल तो घर-घर में टॉयलेट बने हुए हैं। फिर इनकी खुले में शौच की क्या मजबूरी? पूछा तो पता चला कि उनके घर में टॉयलेट तो बना हुआ है, मगर उनका टॉयलेट क्षतिग्रस्त हो चुका है। बाहर शौच जाने में बहुत शर्मिंदगी महसूस होती है। लेकिन क्या करें?''

टॉयलेट क्लिनिक योजना बिहार
बबीता कुमारी कहती हैं कि ''पूनम व रोजी की 'मजबूरी' ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि ना जानें पूनम व रोजी जैसी और कितनी महिलाएं यह पीड़ा भोग रही हैं। इसलिए उसी दौरान ठान लिया कि इनको समस्या से निजात दिलाना है। फिर बीडीओ व डीडीसी के साथ बैठक में समस्या को उठाया और टॉयलेट क्लिनिक योजना के बारे में बताया।''
योजनानुसार जीविका दीदी और वार्ड सदस्य को ग्राम पंचायत के एक-एक घर में भेजकर सर्वे करवाया। पंचायत स्तर पर हुए सर्वे में 100 से अधिक घरों के टॉयलेट में मरम्मत की जरूरत पाई गई। किसी की टॉयलेट सीट टूटी हुई थी तो कोई जाम पड़ा था। किसी का फर्श उखड़ा हुआ तो किसी की दीवार ढह चुकी थी। फिर जीविका दीदी को मिस्त्री (निर्माण) के काम का प्रशिक्षण दिलवाया और एक-एक घर भेजकर टॉयलेट क्लिनिक के तहत टॉयलेट की मरम्मत करके उनको इस्तेमाल योग्य बनाया।

टॉयलेट क्लिनिक की खास बात यह है कि टॉयलेट की मरम्मत के लिए सामग्री प्रखंड पर बने टॉयलेट क्लिनिक से उपलब्ध करवाई। हालांकि इसके लिए पैसे उसी घर से लिए गए, जिनका टॉयलेट ठीक किया गया। उन्हें यह फायदा रहा कि अगर टॉयलेट की मरम्मत में आधा किलो सीमेंट लगनी थी तो आधा किलो सीमेंट ही उपलब्ध करवाई गई। अगर वे अपने स्तर पर मरम्मत करवाते तो उन्हें सामग्री लाते समय आधा किलो सीमेंट की जरूरत पर पूरा बैग लेकर आना पड़ता। दूसरा फायदा यह हुआ कि अगर दो घंटे में मरम्मत का कार्य पूर्ण हो गया तो दो घंटे की ही मजदूरी ना कि पूरे दिन की।
सरकारी जमीन से हटवाया अतिक्रमण
बबीता कुमारी आगे बताती हैं कि ''गांव में सरकारी जमीन कोई भी सार्वजनिक भवन नहीं बना है। गांव में आंगनबाड़ी केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक भवन और पांच सरकारी स्कूल दानदाताओं की जमीन पर बने हैं, जबकि ग्राम पंचायत के पास खुद की 30-35 एकड़ जमीन है। इसमें से 7-8 एकड़ जमीन अतिक्रमण से मुक्त करवाई।
अतिक्रमण हटवाकर उस जमीन पर साल 2022 में ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन इकाई (WPU), पंचायत भवन, जीविका भवन, महानरेगा हाट बाजार का निर्माण शुरू करवाया। पंचायत व जीविका भवन का निर्माण कार्य लगभग पूरा होने को है। जल जीवन हरियाली के तहत पोखर के सौंदर्यकरण का कार्य शुरू करने के लिए एनओसी का इंतजार है।
दिल्ली से बिशनपुर बघनगरी तक का सफर
42 वर्षीय बबीता कुमारी साल 2019 से पहले पति रणजीत कुमार उर्फ बबलू मिश्रा, बेटा रवि राज और बेटी रितिका के साथ दिल्ली के लक्ष्मीनगर में रहती थीं। यहां पर पति का कंस्ट्रक्शन का कार्य था। कोरोना में काम ठप हो गया और उसी दौरान बेटे रवि का बिहार पटना में आनंद कुमार की कोचिंग सुपर-30 में चयन हो गया। दोनों वजह से दिल्ली छोड़कर पटना आ गए और किराए का मकान लेकर रहना शुरू किया।
पटना से बिशनपुर बघनगरी करीब 250 किलोमीटर दूर है। अक्सर गांव आते-जाते उन्होंने स्थानीय लोगों से संवाद किया और उनकी समस्याओं को जाना। इसी के बाद गांव वालों ने उन्हें मुखिया पद के लिए चुनाव लड़ने को प्रेरित किया।
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