वीरप्पा मोइली की प्रगतिशील सोच

बढते मुकदमे
एक बातचीत में उन्होंने बताया कि पूरे देश की अदालतों में बढ़ते मुकदमों की संख्या चिंता का विषय है और उस पर नजर डालना उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी। उनका कहना है कि सबसे ज्यादा मुकदमे तो सरकार की तरफ से ही होते हैं। उनके मंत्रालय की कोशिश होगी कि सरकारी मुकदमों की संख्या में कमी की जाय।
देश की जिला और निचली अदालतों में करीब दो करोड़ 64 लाख मुकदमे विचाराधीन है। उच्च न्यायालयों में करीब 38 लाख मुकदमे हैं। इस तरह से लंबित मुकदमों की संख्या तीन करोड़ से ऊपर है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में करीब पचास हजार मुकदमे सुनवाई का इंतजार कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन मुकदमों में सरकार की तरफ से बड़ी संख्या में मामले या तो दायर किए गए हैं या अपील की गई है।
रोकमाथ जरूरी
नए कानून मंत्री का कहना है कि इस प्रवृत्ति पर रोक लगाई जानी चाहिए। अभी होता यह है कि अगर सरकार के खिलाफ कहीं भी फैसला आ जाता है तो सरकार फौरन अपील कर देती है। नई सरकार की कोशिश है कि अपील करने की सरकारी अफसरों की आदत पर अंकुश लगाया जाय। इस संदर्भ में उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश सरकार के पुलिस भर्ती संबंधी मुकदमे को लिया जा सकता है।
मायावती सरकार के पद संभालने के पहले ही सरकार ने यूपी पुलिस में करीब ख्ख् हजार सिपाहियों की भर्ती की थी। जब मायावती की सरकार आई तो उनको लगा कि सिपाहियों की भर्ती नियम के अनुसार नहीं की गई है लिहाज़ा उन्होंने सिपाहियों की नौकरी खत्म कर दी। पीड़ित पक्ष ने अदालत की शरण ली हजारों नौजवानों के परिवार हाई कोर्ट अपनी फरियाद लेकर पहुंचे। माननीय हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि सिपाहियों की बरखास्तगी गैरकानूनी है और उन्हें फौरन बहाल किया जाना चाहिए।
अदालत के आदेश के बावजूद अफसर हीला-हवाला करते रहे। हाईकोर्ट ने फिर आदेश दिया कि अगर 26 मई तक सिपाहियों को बहाल न किया गया तो उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक के खिलाफ अदालत की अवमानना का मुकदमा चलाया जायेगा। इतने साफ आदेश के बावजूद सरकार ने अड़ंगा डालने की गरज से सुप्रीम कोर्ट में इस आदेश पर स्टे लगवाने के लिए अपील कर दी। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को समझाया कि बिला वजह अदालत का वक्त बरबाद करने की जरूरत नहीं है। वापस जाइए और 26 मई तक हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार सिपाहियों को वापस भर्ती पर लीजिए।
न्याय में देरी
इस केस को उदाहरण के तौर पर इस्तेमाल किया गया है। पूरे देश का सरकारी अफसर इसी तरह अपने गलत फैसलों पर विपरीत आदेश होने पर अदालतों की शरण में चला जाता है। खर्च सारा सरकारी होता है, अदालतों में मुकदमों का अंबार लगा होता है और अपील की सुनवाई में लगने वाले वर्षों के समय की वजह से सरकारी अफसर के गलत फैसलों से जनता और मीडिया की नजर हट जाती है। पीड़ित व्यक्ति या संस्था की कोई सुनवाई नहीं होती और अफसर साफ बच जाता है। कई बार तो अफसर रिटायर तक हो जाते हैं।
इसी समस्या को हल करना नए कानून मंत्री की प्राथमिकता नज़र आ रही है। ऐसा नहीं है कि इस समस्या से देश का न्याय प्रशासन वाकिफ नहीं है। सोली सोराबजी जब एटार्नी जनरल थे तो उन्होंने सरकार को सुझाया था कि ऐसा नियम बनाया जाय कि सरकारी विभाग किसी भी फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के पहले एडीशनल एटार्नी जनरल की कानूनी सलाह अवश्य लें। अगर ऐसा हो गया होता तो बहुत बड़ी संख्या में अपीलें न हो पातीं। इससे सुप्रीम कोर्ट में मुकदमों की संख्या कम हो जाती।
मोइली की पहल
वीरप्पा मोइली भी कुछ इसी तरह की बात कर रहे हैं। उनकी सोच है कि सरकारी अधिकारी और मंत्री जो भी आर्डर पास करे उसको काफी सोच विचार के बाद करे। अगर सही आदेश होगा, न्यायपूर्ण आदेश होगा तो उसके खिलाफ मुकदमे नहीं होंगे और अगर मुकदमा हुआ जिसके बाद सरकारी आदेश रद्द कर दिया गया तो अपील में जाने से पहले फिर गंभीर विचार किया जाय, कानूनी सलाह ली जाय और अगर बहुत जरूरी हो तो ही अपील की जाय।
वीरप्पा मोइली की यह सोच प्रगतिशील है और अगर वह इस दिशा में काम कर सके तो अदालतों पर बोझ भी कम होगा और सरकारी खर्च की भी बचत होगी। अगर समाज में न्याय व्यवस्था ठीक से कायम हो तो मुकदमों की संख्या में निश्चित कमी आएगी।
[शेष नारायण सिंह वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार हैं।]
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