तीसरा मोर्चा या भाजपा की बी-टीम

मार्क्सवाद के बुनियादी सिद्धांतों में एक प्रमुख रणनीति का नाम है- संयुक्त मोर्चा की राजनीति। लेनिन और माओ ने अपने देश की क्रांतियों में इस रणनीति का विधिवत इस्तेमाल किया। अपने देश में भी 30 साल से ज्यादा वक्त से पश्चिम बंगाल में इसका इस्तेमाल हो रहा है और कोलकाता में कम्युनिस्टों की सरकार लगातार चल रही है। वामपंथी विचारधारा की चार पार्टियां सरकार में बनी हुई हैं।

लोकसभा चुनावों के पहले हर बार की तरह एक बार फिर तीसरे मोर्चे का राग शुरू हो गया है। कम्युनिस्ट पार्टी के दोनों धड़ों के आला नेता बीजेपी और कांग्रेस को रसातल में पहुंचाने की कसमें खाने लगे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री एच-डी- देवगौड़ा पूरी तरह सक्रिय हो गए हैं। और उनकी गतिविधियों से लगता है कि उन्हें 1996 की याद लगातार सताती रहती है, जब उनके भाग्य से छींका टूटा था। और प्रधानमंत्री पद उनके हत्थे चढ़ गया था।

कुछ ऐतिहासिक भूलें
उनको यह कभी नहीं भूलना होगा कि बात बड़े-बड़े शूरमाओं की चल रही थी और अकस्मात श्री देवगौड़ा प्रधानमंत्री बन गये थे। यह अजूबा इसलिए संभव हुआ था कि ऐतिहासिक भूल करने में माहिर कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के मझोले नेताओं ने तिकड़म करके ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया था। ज्योति बसु उस वक्त के कम्युनिस्ट आंदोलन के सबसे बड़े नेता थे। वे खुद और पार्टी के महासचिव हरीकिशन सिंह सुरजीत, दोनों ही चाहते थे कि प्रधानमंत्री पद स्वीकार किया जाये, लेकिन माकपा की केंद्रीय कमेटी ने प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। आज की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेता ने ज्योति बसु को प्रधानमंत्री न बनने देने के अगले दस्ते का नेतृत्व किया था। ज्योति बसु अभी तक मानते हैं कि 1996 में प्रधानमंत्री पद से इनकार करना एक बड़ी गलती थी। इस बार यह दिलचस्प होगा कि सत्ता की भागीदारी पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व क्या रुख अख्तियार करता है।

हर बार की तरह इस बार भी तीसरे मोर्चे में तरह-तरह ही राजनीतिक विचारधाराओं के नेता शामिल हैं। जहां तक वामपंथी पार्टियों का सवाल है, उनकी सीटें पचास के आसपास ही रहने की संभावना है। बाकी पार्टियों की राजनीतिक समझ पर चर्चा करना प्रासंगिक होगा लेकिन पहले उनकी संख्या की बानगी लेना ठीक होगा। 1996 की तरह इस बार भी चंद्र बाबू नायडू तीसरे मोर्चे में बहुत सक्रिय हैं। लोकसभा में उनकी पार्टी के सदस्यों की संख्या दहाई में भी नहीं है। इसी तरह तीसरे मोर्चे के बाकी महारथियों की हाल है। अन्ना द्रुमुक, बसपा, टी-आर-एस-, चौटाला की पार्टी सब मिलकर भी वर्तमान लोकसभा का 100 का आंकड़ा नहीं पार कर सकते। जाहिर है कि यू-पी-ए- या एन-डी-ए- में शामिल पार्टियों की मदद के बिना लोकसभा में बहुमत का आंकड़ा साबित कर पाना तीसरे मोर्चे के लिए असंभव होगा।

तीसरा मोर्चा-2009 में जो पार्टियां शामिल है उनके वर्चस्व के इलाकों की सभी सीटों की कुल संख्या 262 है। जाहिर है यह सभी सीटें जीत पाना असंभव है। अगर मायावती, लेफ्ट फ्रंट, टी-डी-पी- के सर्वाधिक आशावादी हालत के मुताबिक सीटों का अंदाज लगाया जाय तो भी इस गठबंधन के लिए 150 सीटों का आंकड़ा पार कर पाना टेढ़ी खीर होगी।

तो बाकी लगभग 125 सीटों कहां से आएंगी। ज़ाहिर है कि बीजेपी या कांग्रेस के सहयोग के बिना तीसरे मोर्चे के लिए सरकार के सपने देखना, मुंगेरी लाल के हसीन सपनों की श्रेणी में ही आएगा।

तीसरे मोर्चे में शामिल पार्टियों के नेताओं के सपनों पर भी गौर करना जरूरी है। उत्तर प्रदेष की नेता मायावती का तो घोषित उद्देश्य है कि किसी तरह से उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठना है। दरअसल उनकी पार्टी का कार्यक्रम ही इस तरह से डिजाइन किया गया है कि उसमें दलित समाज का कल्याण सरकार के जरिए ही संभव है।

लिहाजा वे प्रधानमंत्री पद की पक्की दावेदार हैं। तीसरे मोर्चे के गठन के पहले और बाद वे अपनी इस शर्त का बारंबार जिक्र कर चुकी हैं। प्रधानमंत्री पद पर विराजमान होने की उनकी इच्छा इतनी प्रबल है कि वे मनमोहन सिंह को हटाकर ही पिछले विश्वासमत के दौरान उस पर बैठ जाना चाहती थीं लेकिन प्रधानमंत्री पद के एक अन्य दावेदार

लाल कृष्ण आडवाणी ने उनकी इच्छा को औकात बोध करवा दिया। जयललिता भी अपने को प्रधानमंत्री पद के योग्य मानती हैं और उनकी भी दावेदारी मायावती से कमजोर किसी भी हालत में नहीं आंकी जानी चाहिए। तीसरे मोर्चे की राजनीतिक शक्ति के वर्तमान प्रणेता एच-डी- देवगौड़ा को भी बिना संख्या बल के प्रधानमंत्री पद पर विराजने का पुराना अनुभव है लिहाजा वे भी प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में शिरोमणि हैं। ऐतिहासिक भूल के प्रणेता प्रकाश करात के बारे में भी एक बात साफतौर पर कही जा सकती है कि वे सही मौके को कभी नहीं चूकते इसलिए उनकी भी दावेदारी को दिमाग में रखना जरूरी होगा, क्योंकि ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि इस बार कम्युनिस्ट नेता ऐतिहासिक भूल नहीं करेंगे। वैसे भी तीसरा मोर्चा-2009 नामधारी भानमती के कुनबे में लेफ्ट फ्रंट की ताकत सबसे बड़ी रहने वाली है। वैसे भी प्रकाश करात बाकी उम्मीदवारों में सबसे ज्यादा योग्य व्यक्ति हैं। मार्क्सवाद को अच्छी तरह समझते हैं और उस समझ का इस्तेमाल सर्वहारा की सबसे बड़ी पार्टी के मुखिया को सत्ता के शीर्ष पर बैठाकर संतोष की सांस ले सकते हैं।

बीजेपी से तीसरा मोर्चा 2009 के रिश्ते
तीसरा मोर्चा-2009 की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसमें से सभी कभी-न-कभी बीजेपी और आर-एस-एस की कृपा से सत्ता का सुख भोग चुके हैं। मायावती चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं, जिनमें से तीन बार वे बीजेपी की कृपा से ही गद्दी पर बैठीं। दरअसल बीजेपी के कुछ नेताओं को तो वे राखी भी बांधती हैं और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसक हैं। गुजरात विधानसभा चुनावों में वे नरेंद्र मोदी के लिए बाकायदा प्रचार कर चुकी हैं। यही हाल एच-डी- देवगौड़ा का भी है। उनके पुत्र एच-डी- कुमारास्वामी बीजेपी की मदद से कर्नाटक के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और अब तक वहीं होते अगर झगड़ा न हो गया होता। तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता ने भी दिल्ली में वाजपेयी को मुख्यमंत्री बनवाया था और भाजपा के नेता उनके दिल्ली आने पर शाल भेंट करते नहीं अघाते थे। बीजू जनता दल के नेता नवीन पटनायक तो बीजेपी के बहुत ही मजबूत समर्थक थे और अब, जब उन्हें लगा कि बीजेपी की नैया डूबने वाली है, तो उन्होंने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सीताराम येचुरी का हाथ थाम लिया। ओम प्रकाश चौटाला और उनकी पार्टी भी भारतीय जनता पार्टी के पुराने भक्त हैं। और जैसा कि उनका पुराना रिकॉर्ड है कि सत्ता के लिए किसी से भी समझौता कर लेने में उन्हें संकोच नहीं होता।

तो फिर कौन सा फार्मुला काम करेगा?
जहां तक मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का सवाल है, उसे भाजपा की हितैषी तो नहीं कहा जा सकता लेकिन तीसरे मोर्चे में शामिल भाजपा का भिन्न पार्टियों में किसी भी पार्टी के नेता को अगर प्रधानमंत्री की गद्दी मिलती है, तो माकपा की विचारधारा के स्तर पर कोई दिक्कत नहीं होगी। मिसाल के तौर पर अगर हालत ऐसे बने कि बीजेपी और तीसरे मोर्चे की संख्या जोड़कर 272 की संख्या पार होने की नौबत आयी तो मार्क्सवादी पार्टी के नेता रास्ता निकाल लेंगे। फार्मूला ये बन सकता है कि मायावती प्रधानमंत्री बन जाएं, तीसरे मोर्चे के बाकी नेता शामिल हो जायं और लेफ्ट फ्रंट बाहर से समर्थन कर दे। शर्त यह रखी जायेगी कि गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा सरकार का समर्थन बीजेपी भी बाहर से करे।

यह फार्मूला कोई चौकाने वाला नहीं है, और न ही नया है। इसी फार्मूला के तहत 1989 में केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बनवाई गई थी। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के उस वक्त के महासचिव हरिकिशन सिंह सुरजीत ने विश्वनाथ प्रताप सिंह के समर्थन का ऐलान कर दिया था और प्रेस को बयान दिया कि हम ऐसी किसी भी सरकार को समर्थन नहीं देंगे जिसमें बीजेपी शामिल हो। कांग्रेस पार्टी से बगावत करके निकले वी-पी- सिंह की सरकार में बीजेपी के नेता शामिल होना चाहते थे लेकिन सुरजीत की इस चाल के सामने उनकी एक न चली। जब गतिरोध पैदा हुआ तो सुरजीत से अपना ट्रंप कार्ड चला दिया और कहा कि हम विश्वनाथ प्रताप सिंह को प्रधानमंत्री के रूप में समर्थन दे रहें हैं, हमें इस बात की परवाह नहीं है कि उन्हें और कौन समर्थन देता है। बीजेपी ने वी-पी- सिंह को समर्थन दे दिया और केंद्र में सरकार बन गयी।

इसलिए इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि तीसरे मोर्चे के प्रधानमंत्री के लिए लाइन में लगे नेताओं में से किसी को आगे कर दिया जाय और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और बीजेपी उसे बाहर से समर्थन कर दे। ऐसी हालत में प्रकाश कारत का वह सपना ही पूरा हो जाएगा कि कांग्रेस को सरकार से बेदखल कर दिया जाय और मुलायम सिंह को भी कमजोर कर दें। जाहिर है इस तरह की सरकार सांप्रदायिक ताकतों की गतिविधियों को रोक नहीं पाएगी लेकिन इस बात से तीसरे मोर्चे को गैर कम्युनिस्ट पार्टियों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि कभी न कभी वे सभी बीजेपी के मोहताज रह चुके हैं। इसलिए तीसरे मोर्चे को बीजेपी की बी-टीम कहना बिलकुल सही होगा।

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