अफवाहों की राजनीति पर मीडिया की लगाम

Media
पन्द्रहवी लोकसभा का चुनाव संपन्न हो गया। इस चुनाव में जीत किसी पार्टी की नहीं होने वाली है, लेकिन जनता की जीत पक्की है। अपना जनतंत्र प्रतिदिन मजबूत भी हो रहा है और नेताओं की पूजनीय बनने की इच्छाओं पर लगाम भी लग रही है। इस चुनाव की अगर सबसे महत्वपूर्ण कोई बात है तो वह यह कि भावनात्मक मुद्दे नहीं चल पाए। पार्टियों ने एक भावनात्मक मुद्दा चलाने की कोशिश की तो विरोधी खेमे से तुरंत उसकी काट आ जाती थी और फिर फैसले का अधिकार जनता के पास आ जाता है। इस बार जनता के दरबार में इस तरह के कई मुद्दे आए लेकिन नेताओं की आम आदमी को बेककूफ बनाने की कोशिश नाकाम रही। अफवाहों का बाजार लगने के पहले ही उजड़ जाता था।

सूचना क्रांति का विस्तार

यह सफलता शायद सूचना क्रांति की वजह से आई। टेलीविजन न्यूज का इतना विस्तार हो गया है कि देश के किसी भी हिस्से में कोई भी नेता कुछ भी कहने की कोशिश करता है, पूरे देश को कुछ ही वक्त़ के अंदर पता लग जाता है। नतीजा यह होता है कि जो भी अफवाह फैलाने की कोशिश करता है, वह मुंह के बल गिरता है। इस बार कोई भी नेता हवाबाजी के मुद्दे नहीं चला सका और जनता ने सोच समझकर वोट दिया। यह चमत्कार सूचना क्रांति और टीवी न्यूज चैनलों के विस्तार की वजह से संभव हो सका।

पांचों दौर का चुनाव खत्म हो जाने के बाद कुछ ऐसे मुद्दों की चर्चा करने की कोशिश करते हैं, जो वास्तव में मुद्दे नहीं थे लेकिन राजनीतिक पार्टियों ने उनको चलाने की कोशिश की और वे हवा में उड़ गए। सबसे पहला मुद्दा तो बीजेपी और संघ परिवार के कंट्रोल में चलने वाली अन्य राजनीतिक पार्टियों ने उठाने की कोशिश की कि देश में आतंकवाद है और मुसलमान ही आतंकवादी होता है। बीजेपी का हर नेता आतंकवाद को मुसलमान का पर्यायवाची बनाने की कोशिश में जुट गया लेकिन जब आरएसएस के ही सहयोगी संगठनों के कई लोग आतंकवादी गतिविधियों की चपेट में आ गए, मालेगांव विस्फोट में आरएसएस के खास लोग पुरोहित और प्रज्ञा ठाकुर पकड़ लिए गए और मीडिया ने इन ख़बरों पर जमकर बहस मुबाहसा करवाया तो बीजेपी वालों ने मुसलमान को आतंकवादी साबित करने की अपनी कोशिशों को बंद कर किया।

फुस्स हो गए बीजेपी के मुद्दे

इसके बाद बीजेपी ने महंगाई को मुद्दा बनाने की कोशिश की लेकिन मनमोहन सिंह सरकार ने एक महीने के अंदर पेट्रोल और डीजल की कीमतें दो बार घटाकर मध्यवर्ग के दिमाग में बैठा दिया कि सरकार तो मंहगाई घटा रही है और बीजेपी वाले इसका उल्टा प्रचार कर रहे हैं। फिर बीजेपी ने वाजपेयी सरकार के अच्छे शासन की बात को चलाने की कोशिश की और मंसूबा बनाया कि मनमोहन सिंह की सरकार को फिसड्डी साबित कर दिया जाय। वह भी नहीं हो सका। कांग्रेसियों ने तो कोई प्रतिकार नहीं किया लेकिन मीडिया ने वाजपेयी सरकार के अच्छे शासन के तर्क की हवा निकाल दी। कंधार में केंद्र सरकार का समर्पण, संसद पर आतंकवादी हमला, औने पौने दामों पर सरकारी संपत्ति को बेचना कुछ ऐसे मामले थे जोकि उस वक्त की सरकार को अक्षम भी साबित करते थे और भ्रष्ट भी।

कंधार प्रकरण का कांग्रेस ने ऐसा इस्तेमाल किया कि बीजेपी के उस नारे की हवा निकल गई जिसमें दावा किया जा रहा था कि लालकृष्ण आडवाणी एक मजबूत नेता हैं। आज देश जानता है कि जो नेता कंधार में समर्पण करता है और गृहमंत्री के रूप में संसद भवन पर हमले की साज़िश की इंटेलीजेंस जानकारी नहीं उपलब्ध करासकता वह मजबूत तो बिलकुल नहीं है। फिर बीजेपी ने एनडीए को मजबूत गठबंधन के रूप में पेश करने की कोशिश की। मीडिया ने आइना दिखा दिया कि नवीन पटनायक, चंद्रबाबू नायडू, जयललिता, मायावती जैसे नेता जो कभी एनडीए के समर्थक हुआ करते थे आज बीजेपी के खिलाफ अड़े है।

चुनाव प्रक्रिया के तीन चरण खत्म होने के बाद बीजेपी ने अपने मित्र पत्रकारों की मदद से यह प्रचार करने की कोशिश की कि एनडीए ने जबरदस्त बढ़त हासिल कर ली है। एकाध टी.वी. चैनलों पर इस बात को चलवाने में कामयाबी भी हासिल कर ली लेकिन जब उन चैनलों में काम करने वाले गंभीर और ईमानदार पत्रकारों को पता चला तो इस अभियान को फौरन रोक दिया गया और अब तो हर चैनल यही कह रहा है कि और किसी की सरकार बन जाय, बीजेपी की नहीं बनने वाली है। बात तो यहां तक पहुंच गई है कि जो भी सरकार बनेगी, धर्मनिरपेक्ष बनेगी और उसमें बीजेपी का कोई नेता किसी भी कीमत पर शामिल नहीं होगा।

कांग्रेसः बिना मुद्दों वाले मुद्दे

कांग्रेस की तरफ से भी कुछ ऐसे मुद्दे चलाने की कोशिश की गई जो वास्तव में मुद्दे नहीं थे। चुनाव अभियान के बहुत ही शुरुआती दौर में कांग्रेस नेता अर्जुन सिंह ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश करने की कोशिश की। शायद उनकी कोशिश थी कि कांग्रेस के आला दरबार में अपने नंबर बढ़वाए जायं लेकिन बात जमी नहीं। सोनिया गांधी और राहुल गांधी की तरफ से ही कह दिया गया कि ऐसी कोई बात नहीं है। अर्जुन सिंह तो चुप हो गए लेकिन बीजेपी ने इस प्रसंग को वंशवाद की राजनीति से जोड़कर तूल देने की कोशिश की। प्रचार शुरू कर दिया कि मनमोहन सिंह तो ऐसे ही हैं, कुछ दिन तक गद्दी पर रहेंगे फिर राहुल गांधी के पक्ष में सन्यास ले लेंगे। लेकिन मीडिया ने बाकायदा हस्तक्षेप किया और बात दफन हो गई। बीजेपी वाले तो अभी तक इस बात को चलाते रहते हैं, लेकिन मीडिया इसे नोटिस नहीं ले रहा है।

वरुण को भी हुआ नुकसान

बीजेपी ने आक्रामक हिंदुत्व के अपने कार्यकर्ताओं में नई भरती की योजना बना रखी है। प्रवीण तोगडिया और नरेंद्र मोदी जैसे लोग बासी हो चुके है। अगली पीढ़ी के भड़काऊ भाषणबाजों के शीर्ष पर स्वर्गीय संजय और मेनका गांधी के बेटे, वरुण गांधी को बैठाने की कोशिश की। गुप्त रूप से एक सीडी बाजार में आ गई जिसमें दिखाया गया था कि वरुण गांधी किसी खास वर्ग के लोगों के हाथ काटने की धमकी दे रहे हैं। इस भाषण के सहारे बीजेपी वालों ने हिंदू ध्रुवीकरण की कोशिश की लेकिन बात चली नहीं, वोटों का फायदा तो हुआ नहीं, वरुण गांधी ने भी कसम खा ली कि आगे तमीज से रहेंगे, किसी का हाथ काटने की कोशिश नहीं करेंगे। दरअसल वरुण गांधी के हृदय परिवर्तन में जेल जाने के खौफ का ज्यादा योगदान हैं।

इतने बड़े विवाद में उनके घिर जाने का उन्हें बड़ा नुकसान हुआ। उन्होंने अफवाह फैला रखी थी कि वे लंदन स्कूल ऑफ इकनामिक्स के पूर्व छात्र हैं। इस अफवाह के चलते मध्यवर्ग और पढ़े-लिखे लोगों में उनकी इज्जत भी थी लेकिन हाथ काटने की धमकी वाले प्रकरण के बाद लंदन स्कूल ऑफ इकनामिक्स ने बाकायदा बयान जारी करके कहा कि वरुण गांधी कभी भी उनकी संस्था में विद्यार्थी नहीं थे। इस तरह अनपढ़ और झूठा साबित होने के बाद वरुण गांधी बेचारे बहुत निराश बताए जा रहे है।

लालू और पासवान की कवायद

अफवाहों के सहारे राजनीति करने की अन्य पार्टियों की कोशिश को भी मीडिया ने औकात बताने का काम किया है। कांग्रेस के नेताओं ने यह बताने की कोशिश की कि इस बार उत्तरप्रदेश और बिहार का मुस्लिम मतदाता उनके साथ है लेकिन मतदान प्रक्रिया के खत्म होने के बाद यह साफ हो गया है कि ऐसा नहीं है। मुसलमान और अन्य धर्मनिरपेक्ष लोग केवल उस जमात के साथ हैं जो बीजेपी को हराने की इच्छा और क्षमता रखती है। बिहार में लालू यादव और रामविलास पासवान ने यह अफवाह फैला रखी थी कि वहां कांग्रेस की कोई औकात नहीं है।

नाराज कांग्रेस ने हर सीट पर उम्मीदवार उतार दिया, नतीजे अभी नहीं आए हैं लेकिन मीडिया ने यह साबित कर दिया है कि लालू और पासवान की यह अफवाह बेदम थी और कांग्रेसी उम्मीदवारों ने चौथे मोर्चे का खासा नुकसान कर दिया है। इसी तरह से वामपंथी पार्टियों ने यह अफवाह चला रखी थी कि पश्चिम बंगाल में लेफ्ट फ्रंट अजेय है और उसे बेदखल करना मुश्किल है। नंदीग्राम और सिंगुर की जिस तरह से मीडिया ने कवरेज की उससे साफ हो गया है कि एक अफवाह को सच बनाने की वामपंथियों की कोशिश नाकाम रही है। चुनाव खत्म हो चुके हैं और इस चुनाव में जनतंत्र ओर आम आदमी की जीत हुई है। सूचना क्रांति और आम आदमी तक उसकी पहुंच ने चुनाव का दायरा बहुत बढ़ा दिया है। टीवी चैनलों की भरमार के चलते बहुत बड़े चैनलों पर बैठे अर्द्घज्ञानी विशेषज्ञों के आप्तवचन नुमा ज्ञान सुनकर ऊब चुकी जनता अब अपनी ही भाषा में सही मायनों में विशेषज्ञों से ज्ञान ग्रहणकर रही है और अफवाह फैला सकने की नेताओं की इच्छा और क्षमता का सर्वनाश हो चुका है। यह हमारे विकासमान लोकतंत्र के लिए बहुत अच्छे लक्षण है।

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