धर्मनिरपेक्ष सरकार की आहट
लोकसभा के अंदर बीजेपी के कुछ सांसदों ने नोटों के बंडल लहराए। सांसदों की खरीद-फरोख्त के आरोप लगे। देश और संसद की गरिमा पर बट्टा लगाने की कोशिश हुई। वामपंथियों के समर्थन वापस लेने और बीजेपी के साथ मिलकर वोट देने के बाद यह बात बिल्कुल साफ हो गई कि अगर प्रकाश करात को गुस्सा आ गया तो वे कुछ भी कर सकते है।
नेताओं के तेवर बदले
परमाणु समझौते से जुड़े राजनीतिक संकट के बाद बहुत कुछ बदल गया है। वे लोग जो राजनीतिक रूप से अपने विरोधियों को तबाह करने की योजना बना रहे थे, अब सुलह-सफाई की बात करने लगे हैं। चुनाव अभियान के दौरान भी राजनीतिक कारणों से नेता लोग एक दूसरे के खिलाफ सख्त भाषा का प्रयोग कर रहे थे। लेकिन अब चुनाव में मतदान का काम पूरा हो गया है और तल्खियां धीरे-धीरे कम हो रही हैं।
इस दिशा में आज लालू प्रसाद यादव ने पहला कदम उठा लिया। अपने खास सहयोगी प्रेमचंद्र गुप्त के साथ उन्होंने कांग्रेस आलाकमान के दरबार में हाजिरी दी। लालू यादव को जबसे पता चला था कि बिहार में मुस्लिम वोटों के बड़े हिस्सेदार के रूप में कांग्रेस पार्टी उभरी है, तबसे वे कांग्रेस पार्टी के खिलाफ बहुत सख्त भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे। माना जा रहा था कि उनके और कांग्रेस के बीच दूरियां बढ़ेंगी लेकिन आज की मुलाकात से करीब आने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।
सबके अपने समीकरण
राजनीतिक संभावनाओं का खेल है, यह सभी जानते हैं। भारतीय राजनीति में कुछ पार्टियां ऐसी हैं जो सांप्रदायिकता का विरोध इसलिए करती हैं कि अगर हिंदुत्ववादी ताकतें सत्ता में आ गईं तो उनकी राजनीति तबाह हो जायेगी। वामपंथी पार्टियां, समाजवादी पार्टी और लालूप्रसाद यादव इसी श्रेणी में आते हैं। इसलिए इनके अस्तित्व के लिए जरूरी है कि केंद्र में ऐसी सरकार बने जो सांप्रदायिक ताकतों का हर मोड़ पर विरोध करे। दूसरा वर्ग उन पार्टियों का है जो एनडीए गठबंधन में शामिल हैं। उन्हें तो वहीं रहना है।
तीसरा वर्ग ऐसी पार्टियों का है जो जिधर भी सरकार हो उसमें शामिल होने का पुराना अनुभव रखती है। इसमें फारुख अब्दुल्ला, नवीन पटनायक, चंद्रबाबू, मायावती, जयललिता, ममता बनर्जी, रामविलास पासवान जैसे नेता आते है। माना जा रहा है कि अगर यूपीए को बढ़त मिली तो यह लोग तुरंत उसकी तरफ कूच कर देंगे लेकिन अगर कोई कसर बाकी रह गई तो एनडीए की तरफ भी मुखातिब हो सकते हैं। इसलिए जो शुद्घ रूप से सांप्रदायिकता विरोधी पार्टियां हैं, उनको तुरंत साथ आना पड़ेगा वरना खतरा यह है कि संभावित साथी एनडीए के खेमे में न चले जाए।
वामपंथी दलों की चुनौतियां
सांप्रदायिक शक्तियों की सरकार के बनने का सबसे बड़ा खतरा वामपंथी पार्टियों को है। माना जाता है कि अगर लालकृष्ण आडवाणी प्रधानमंत्री बन गए तो कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं के लिए जिंदगी बहुत सुखकर नहीं रह जायेगी। इस बात का अंदाज बड़े मार्क्सवादी नेताओं को भी है। इसीलिए प्रकाश करात के व्यवहार की तल्खी झेल रहे लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने आज सुलह-सफाई की बात शुरू कर दी और दुबारा पार्टी में अपनी वापसी की गेंद सीपीएम के आला नेतृत्व के पाले में फेंक दी। कोलकाता में अपना वोट डालकर जब सोमनाथ चटर्जी बाहर निकले तो पत्रकारों को बताया कि हालांकि वामपंथी पार्टियों के सांसदों की संख्या पहले से कम होने की संभावना है लेकिन केंद्र में एक धर्म निरपेक्ष सरकार बनाने में कम्यूनिस्टों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
इसके पहले पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने भी कहा था कि प्रकाश करात के अभी दिए जा रहे कांग्रेस विरोधी बयान 16 मई के बाद बदल जाएंगे। उन्होंने साफ किया कि सरकार को समर्थन देने के बारे में 16 मई के बाद फैसला लिया जायेगा। उसके बाद प्रकाश करात वही बोलेंगे, जो केंद्रीय कमेटी का फैसला होगा। प्रकाश करात जिस पार्टी के सदस्य हैं उसमें केंद्रीय कमेटी ही फैसले करती है। किसी की मनमानी नहीं चलती वह चाहे जितना बड़ा नेता क्यों न हो।
इसी केंद्रीय कमेटी ने ज्योति बसु को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया था जबकि पार्टी महासचिव और ज्योतिबसु दोनों ही सरकार की अगुवाई के पक्ष में थे। इसका मतलब यह हुआ कि 16 मई के बाद केंद्र में गैर भाजपा सरकार बनने की संभावना प्रबल है। प्रधानमंत्री पद पर मनमोहन सिंह भी बैठ सकते हैं, या तीसरे मोर्चे का कोई और नेता। इस बात पर फैसला बाद में होगा लेकिन साफ लग रहा है कि एक धर्म निरपेक्ष सरकार के कदमों की आवाज सुनाई दे रही है।
[शेष नारायण सिंह वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार तथा कॉलमिस्ट हैं।]
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