भानुमति के पिटारे से फिर निकला कुपोषण का जिन्न

सच कहा जाये तो भारत में कुपोषण की समस्या द्रोपदी के चीर की तरह लंबी होती चली जा रही है। अब तो उसे घर-घर जाकर ढूंढने की नौबत आ गई है। दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में कुपोषित बच्चों को खोजने के लिए हर गाँव में सर्च ऑपरेशन करवाया जा रहा है। इसके लिए आगंनबाड़ियों की टीम बनायी गई है, जो घर-घर जाकर कुपोषित बच्चों की तलाष करेंगे।
बच्चों के वजन को मापने के लिए प्रषासन ने 850 मशीनों की व्यवस्था दूर के गामीणों अंचलों में करवाया है। आगंनबाड़ी कार्यकत्री नवजात शिशुओं से लेकर छह साल के बच्चों के स्वास्थ की लगातार निगरानी करते रहेंगे। साथ ही इनका काम होगा-गाँव की महिलाओं को कुपोषण के लक्षणों और उसके निदान के लिए जरुरी उपायों के बारे में जागरुक करना।
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इस पूरे कवायद को प्रभावषाली बनाने के लिए गाँवों में बच्चों के लिंग के अनुसार चार्ट बनाया जा रहा है। इस चार्ट से कुपोषित होने वाले बच्चों पर सही तरीके से नजर रखी जा सकेगी। यदि कोई बच्चा कुपोषित नजर आयेगा तो उसको दुगना पोषाहार दिया जायेगा। किसी बच्चे का वजन लगातार कम होते रहने की स्थिति में उसका अस्तपताल में ईलाज करवाया जाएगा।
कहने का तात्पर्य है कि कुपोषण को जड़ से खत्म करने के लिए गाजियाबाद जिले की प्रषासन ढृढ़संकल्पित है। अब देखने की बात है कि ये सारी कवायद किस हद तक कामयाब होती है, क्योंकि सरकार कुपोषण की समस्या को जड़ से मिटाने के लिए हमेशा दावा करती है, किंतु हर बार उसका दावा खोखला साबित हो जाता है। यही कारण है कि भारत में कुपोषण की समस्या को लेकर विष्व स्वास्थ संगठन से लेकर यूनीसेफ तक लगातार अपनी चिंता जताते रहे हैं।
उत्तरप्रदेश की तरह ही कुपोषण की समस्या मध्यप्रदेष में भी गंभीर है। अभी हाल ही में वहाँ के लोक स्वास्थ मंत्री ने विधानसभा में माना था कि राज्य में पाँच वर्ष आयु तक के बच्चों में, 1000 में से तकरीबन 70 बच्चे कुपोषण से प्रतिवर्ष मर जाते हैं। 2005 से 2009 के बीच में राज्य के कुल 50 जिलों में से 48 में एक लाख तीस हजार दो सौ तैंतीस बच्चे कुपोषण के कारण मर चुके थे।
विडम्बना यह है कि इसी दौरान राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ मिशन के तहत राज्य को 1600 करोड़ रुपये आवंटित किये गये थे। जाहिर है राज्य में आवंटित राशि का जमकर दरुपयोग किया गया होगा। पहले भी राज्य में आवंटित राशि का या तो सदुपयोग नहीं किया गया था या फिर जमकर उसकी हेरा-फेरी की गई थी।
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चालू वित्त वर्ष में जरुर सरकार को थोड़ी सी अक्ल आई है। इस वितीय वर्ष में आवंटित राशि से ज्यादा खर्च सरकार कर चुकी है। अगर आगे के सालों में भी सरकार कुपोषण की समस्या को गंभीरता से लेती है तो शायद मध्यप्रदेष में कुपोषण के षिकार बच्चों की संख्या में कमी आ जाये। फिलहाल तो दिल्ली अभी बहुत दूर है।
इसी संदर्भ में अपने हालिया बयान में केंद्रीय स्वास्थ मंत्री श्री गुलाम नबी आजाद ने माना था कि पूरे देष में लगभग 25 प्रतिषत बच्चों को प्रतिवर्ष प्रतिरोधक टीके नहीं लग पाते हैं। मुद्वा यहाँ पर फिर से गरीबी और अशिक्षा का है। हमारे देश में अभी भी कम उम्र में लड़कियों की शादी कर दी जाती है और गर्भावस्था के दौरान पोषाहार नहीं मिलने के कारण कमजोर और कुपोषित बच्चे पैदा लेते हैं।
मनरेगा की तरह राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ मिशन योजना भी एक अच्छी योजना है। इस योजना का मूल मकसद है दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं और बच्चों की स्वास्थ संबंधी समस्याओं को दूर करना। इसके अलावा पहले से एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम भी देश के विविध राज्यों में चल रहा है। उल्लेखनीय है कि इस योजना की शुरुआत हमारे देष में कुपोषण से निजात पाने के लिए ही गई थी।
अब जरुरत है कि इन योजनाओं के तहत मिलने वाली राषि का राज्य सरकार दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ सेवाओं को बेहतर करने में इस्तेमाल करे। आज हमारा देश कुपोषण के मामले में पूरे विष्व में सबसे ऊपर है। यह निष्चित रुप से हमारे लिए शर्म से डूब मरने वाली बात है। आमतौर पर हमारे देश में यह तर्क दिया जाता है कि कुपोषण की समस्या का मूल कारण आबादी है, पर अगर हम अपनी तुलना चीन से करेंगे तो हमारा खुद का तर्क हमें ही खोखला और बेमानी लगने लगेगा। चीन की जनसंख्या हमारे देश से कहीं अधिक है। फिर भी वहाँ कुपोषण के शिकार बच्चे हमारे देश से छह गुणा कम हैं।
लब्बोलुबाव यह है कि हमारे देष में न तो सरकार कुपोषण की समस्या को दूर करने के लिए चिंतित है और न ही हम। हमारे राज्यों में स्वास्थ के मद पर खर्च की जाने वाली राषि का या तो उपयोग नहीं किया जा रहा है या फिर उस राषि का दुरुपयोग किया जाता है। हालाँकि हम जानते हैं कि बच्चे ही देष के कर्णधार हैं। बावजूद इसके हम सभी अफीम के नशे में गाफिल़ हैं।
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