Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

भूमि सुधार के मायने और उसके निहितार्थ

Bihar Map
अनादिकाल से ही बिहार में क्रांति के बीज बोये जाते रहे हैं। बुद्व और महावीर के जीवन में बदलाव भी इसी धरती की देन रही है। आज़ादी के बाद भी इसी भूमि के एक लाल श्री जयप्रकाश नारायण ने पूरे देश में एक नई क्रांति का सूत्रपात किया था। भले ही इन महापुरुषों का संबंध बिहार से रहा हो, लेकिन उनके उपदेशों का प्रभाव यहां की ज़नता पर कभी नहीं पड़ा।

बौद्व और जैन धर्म का विस्तार विदेशों में तो जरुर हुआ, परन्तु बिहार में दोनों धर्म फलने-फूलने से वंचित रह गये।
ज़माना बदलता रहा, पर हम आज़ भी वहीं जस-के-तस खड़े हैं। जहां थे! हमने प्रगति तो ज़रुर की है, किन्तु केवल अपनी भौतिकवादी आवयकताओं को पूरा करने के संदर्भ में। आज भी बिहार में जहां कुछ लोग बहुत ही अमीर हैं, वहीं कुछ लोग बहुत गरीब। इस खाई को पाटने के लिए कभी भी किसी सरकार ने कोई कोशिश नहीं की। ज़मीनी हकीकत यही है कि समाजवाद और समानता जैसे शब्द आज भी उनके लिए बेमानी हैं। यहां समाजवाद और समानता का अर्थ है-एक ऐसे समाज की परिकल्पना, जिसके अंदर सामाजिक एवं आर्थिक विषमताओं को कोई स्थान न मिले। मूलत: समतामूलक आर्थिक-सामाजिक संरचना की संकल्पना ही इसके मुख्य सरोकार हैं।

बिहार में जमींदारों का इतिहास बहुत ही दागदार रहा है। जमींदार सवर्ण हो किसी पिछड़े वर्ग का; उनके अत्याचार करने के तरीके एक समान हैं। दोनों बहुत ही बर्बर और भयावह रास्ता अख्तियार करते हैं, अपने विरोधियों का सफ़ाया करने के लिए। इनकी एक ही ज़ाति है -अमीरी और शानो-शौकत। बस अपना साम्राज्य बचाना ही इनका मुख्य उद्वेय है और यदि इसको बचाने के लिए ख़ून की नदियां भी बहानी पड़े, तो इनको इससे कोई गुरेज़ नहीं।

सन्‌ 1977 के बेलछी कांड को क्या हम भूल सकते हैं ? पिछड़े वर्ग की दबंग जाति कुर्मी के एक परिवार ने 11 भूमिहीन दलितों को ज़िंदा ज़ला दिया था। इस असीम घटना का कारण था-जमीनी विवाद। जयप्रकाश नारायण भले ही कभी सत्ता में नहीं रहे, परन्तु उनके तथाकथित चेलों ने सत्ता का ख़ूब स्वाद चख़ा है। पहले लालू प्रसाद यादव और अब नितीशा कुमार। दोनों पिछड़े वर्ग से संबंध रखते हैं। लालू प्रसाद जहां यादव जाति के हैं, वहीं नितीश कुमार कुर्मी जाति के। दोनों जाति बिहार में दबंग मानी जाती है। एक दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही नेता अपने को दलितों का हिमायती बताते हैं।

वैसे भूमि सुधार का मुद्वा काफ़ी अरसे से ठंडे बस्ते में पड़ा था, परन्तु इसे पुन: बाहर निकालने का काम किया नितीश कुमार ने। शायद सत्ता पाने की ख़ुशी में, कुछ कर गुज़रने की चाहत में या फिर भोली-भाली जनता को बेवकूफ़ बनाने के लिए। बिहार में जमींदारों के वर्चस्व और इस खेल में अगड़ों और पिछड़ों के शामिल होने के कारण ही लालू प्रसाद जैसा दबंग नेता भी इस संबंध में कभी भी कोई पहल नहीं कर सका।

तकरीबन 3 साल पहले नितीश सरकार ने श्री देवव्रत बंदोपाध्याय की अध्यक्षता में भूमि सुधार आयोग का गठन किया था। श्री देवव्रत बंदोपाध्याय वही शख्स हैं जिन्होंने पचिम बंगाल में भूमि सुधार के लिए सिफ़ारिश की थी और उस सिफ़ारिश को वहां की सरकार ने लागू भी कर दिया था। पर इन्हीं बंदोपाध्याय साहब का कहना है कि बिहार में भूमि सुधार कभी भी नहीं हो सकता, क्योंकि यहा के जमींदारों की भागीदारी राजनीति में है।

कुछ दिनों पहले जब बंदोपाध्याय ने भूमि सुधार से संबधित अपनी रिर्पोट नितीश सरकार को दी और जब उसके कुछ भागों को निताश सरकार द्वारा लागू करने की बात कही गई तो जमींदारों के बीच ख़लबली मच गई। यहां बवाल मचना स्वाभाविक भी था। पहले भी जब सन्‌ 1950 में जमींदारी उन्मूलन कानून पास हुआ था, तब भी काफी हो-हल्ला मचा था। 1955 में हदबंदी कानून पास होने पर भी उसी तरह से सारी कवायद एक बार फिर से की गई थी।

लोकतांत्रिक देश होने के कारण भारत में समाजवाद और समानता की संकल्पना को आश्चर्य भरी नज़रों से नहीं देख़ा ज़ाता है। यहां समतामूलक समाज की बात एक अरसे की जा रही है। अमीरी-गरीबी के बीच व्याप्त खाई को पाटने के दिवा स्वप्न को भी कुछ लोग देख रहे हैं। मार्क्सवाद से लेकर अंबेदकरवाद का उद्देश्य भी यही रहा है-दलितों की समस्या का निदान यानि उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में सुधार लाना। मार्क्सवाद भले ही विदेशी विचारधारा हो, पर यह भारत के आलोक में आज भी प्रासंगिक है।

वस्तुत: भूमि सुधार भी गरीबी दूर करने की दिशा में बढ़ाया गया एक कदम है। अस्तु इतना जरुर है, अगर इसे लागू कर दिया गया तो गरीब और भूमिहीन किसानों की स्थिति में आमूल-चूल परिर्वान आयेगा। उनकी आर्थिक और सामाजिक हैसियत बदलेगी। नक्सलवादी और जातीय हिंसा से हमें छुटकारा मिल सकेगा।

रणवीर सेना और माओवादियों के बीच 90 के दाक में हुये टकराव और नरसंहार के पीछे मूल रुप से भूमि सुधार का नहीं होना ही रहा है। बिहार में जातीय सेनाओं द्वारा कत्लेआम करना एक आम बात है। माओवादियों और पीपुल्स वार ग्रूप के सदस्यों से निपटने के लिए ही दबंग जातियों ने अपनी-अपनी निजी सेना बनाई। इस मामले में पिछड़ी जाति वाले संभ्रांत भी पीछे नहीं हैं। कुर्मी जाति की भूमि सेना की भूमिका इस मामले में बेहद सक्रिय रही है।

इस संबंध में दिलचस्प बात यह है कि आयोग की रिर्पोट को बहुत दिनों तक दबा कर रखा गया था। लेकिन विधानसभा के उप चुनावों के ठीक पहले इसका पिटारा खोला गया ताकि इसका फ़ायदा सरकार को मिल जाये, लेकिन हुआ ठीक इसके उलटा। मज़बूरन नितीश कुमार ने रिर्पोट के निहितार्थों का अध्ययन करने के नाम पर एक प्रशासनिक अधिकारी की अध्यक्षता में एक और कमेटी का गठन कर दिया। इससे निताश कुमार की मंशा स्पष्ट हो गई कि वे किसी भी कीमत पर भूमि सुधार की सिफारिशों को लागू नहीं करना चाहते हैं।

नितीश कुमार की छवि एक ढुल-मुल नेता की रही है। ये विकास की बात तो करते हैं, लेकिन उसके लिए जरुरी कदम उठाने से हमेशा परहेज़ करते हैं। साहसिक फैसला लेने की कूवत उनमें कभी नहीं रही है। उनकी मज़लिस में ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा है, जिनका अहित भूमि सुधार की सिफ़ारिशों को लागू करने से हो सकता है।

इससे पहले भी नितीश सरकार मुचकुंद दुबे की अधयक्ष्ता में गठित 'समान स्कूल प्रणाली", 'किसान आयोग" और 'अति पिछड़ा वर्ग" के रिर्पोटों को ठंडे बस्ते में डाल चुकी है। नितीश सरकार ने कुछ ऐसे भी काम किये हैं, जिससे ऐसा लगता है कि उनकी रणनीति हमेशा से सामंतवादों को लाभ पहुचाने की रही है। दलित की श्रेणी में अन्य जातियों को शामिल करने या निर्वामान जाति को दलित की श्रेणी से अलग करने जैसी सिफारिशों को इस सरकार ने हमेशा मान लिया है। इस तरह के फैसलों से किसी समाजिक क्रांति की शुरुआत तो कदापि नहीं हो सकती। इसका दूसरा पहलू यह है कि इससे रणवीर सेना या फिर अन्य सेनाओं के सूत्रधारों को ही फायदा पहुंच सकता है।

वैसे हम इसके लिए नितीश कुमार को ही क्यों कोसें? भारतीय समाज़ की संरचना की हर परत में हर पल गरीबों के साथ अन्याय किया जा रहा है। बैंकों का राष्टीयकरण तो सामाजिक सरोकारों को पूरा करने के लिए किया गया था, लेकिन आज यही राष्टीयकृत बैंक विकास और प्रतिस्पर्धा के नाम पर औधोगिक घरानों को 3 से 5 फीसदी पर गरीबों का पैसा ऋण के रुप में मुहैया करवा रही है। जबकि एक आम आदमी को वही ऋण 14 से 15 प्रतिशत की ब्याज दर पर भी नहीं दिया जाता है। यद्यपि हमारे समाज में औधोगिक घरानों का देश के विकास में योगदान आज भी नगण्य है। फिर भी सरकार उनको विकास के नाम पर फ़ायदा देने में कोई कोर-कसर नहीं रखना चाहती । यह तो बानगी भर है। हमारे समाज में इस तरह की विसंगतियों की भरमार है।

श्री बंदोपाध्याय की अध्यक्षता वाले आयोग की मूल सिफ़ारिशें थीं- एक नया बटाईदार कानून लाना या फिर वर्तमान कानून में संशोधन लाकर इसे पुख्ता बनाना। इसके अलावा अन्य महत्वपूर्ण चीजें थीं-गैरमजरुआ जमीन का वाज़िब इस्तेमाल, भूमि हदबंदी को सही तरीके से लागू करना, भूदान में मिली जमीन से संबंधित विवादों का निपटारा इत्यादि। निश्चित रुप से अफसोस की बात है कि भूमि सुधार के सारे रास्ते आज भी बंद हैं। कब ये खुलेंगे? कोई नहीं बता सकता?

वास्तव में बिहार में आज भी 'साग के आगे सबकुछ फ़ीका" है। भूमि सुधार को लागू करने का खतरा कम-से-कम कोई भी राजनीतिक पार्टी यहां नहीं ले सकती है। दरअसल यहां का सामाजिक ताना-बाना कुछ इस कदर से उलझा हुआ है कि उसमें किसी भी सुधार की कोई गुंजाईश कभी भी नहीं हो सकती।

वोट की राजनीति करने वालों के साथ कुर्सी जाने की मज़बूरी हो सकती है। पर हमारे और आपके साथ किस तरह की मज़बूरी है? हम क्यों इस सड़ांध में जीना चाहते हैं ? इस तरह के प्रश्नों का जबाव निश्चित रुप से हमारे पास नहीं है। लगता है हम अपनी गंदगी पर बनी किसी सिनेमा द्वारा आस्कर जीतने में ही खुश हैं।

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+