एक साल बाद भी नोटबंदी किसानों की मायूसी की वजह बना हुआ है

नई दिल्ली। नोटबंदी को तरीबन एक साल हो गए हैं लेकिन इसका नकारात्मक असर अब भी लोगों को देखने को मिल रहा है। गत वर्ष नोटबंदी और फिर जीएसटी ने किसानों के चेहरे मायूस कर दिए हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक इस बार मानसून के ठीक रहने के बाद भी किसानों के चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं आई है, इसकी बड़ी वजह है कि तमाम उत्पादों के दामों में कमी। रिपोर्ट के मुताबिक इसकी बड़ी वजह है नोटबंदी और जीएसटी। इसमे कहा गया है कि कृषि उत्पादों के दाम में बढ़ोत्तरी नहीं हुई है, जबकि गैर कृषि उत्पाद में भी आय बिल्कुल नगण्य के बराबर है। देश के दो तिहाई लोग ग्रामीण आय पर निर्भर रहते हैं, लेकिन जिस तरह से नोटबंदी की गई, जीएसटी को लागू किया गया, खनन पर रोक लगाई गई, उसकी वजह से काफी नुकसान का सामना करना पड़ा है।

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हालांकि क्रेडिट के बढ़ने से खपत में थोड़ी बढ़ोत्तरी हुई है, लेकिन उत्पादों के दामों में बढ़ोत्तरी नहीं होने की वजह से किसान मायूस हैं। रूरल सफारी की रिपोर्ट में कहा गया है कि नोटबंदी का असर अब भी बरकरार है, हम औसत आय के मामले में ग्रामीणों की आय में नाम मात्र की बढ़ोत्तरी को देख सकते हैं, बावजूद इसके कि इस बार मानसून अपेक्षाकृत बेहतर था। इस रिपोर्ट में कृषि उत्पादों में बढ़ोत्तरी को बहुत ही कम बताया गया है, जबकि गैर कृषि ग्रामीण उत्पाद में बढ़ोत्तरी लगभग शून्य बताई गई है।

अभी भी जिस तरह से बालू खनन पर रोक लगी है और कैश लेन-देन मे सीमा तय की गई है , जीएसटी को लागू किया गया है उसकी वजह से कृषि उत्पादों के दाम में बढ़ोत्तरी नहीं हो रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि खरीफ की फसल के दामों में बढ़ोत्तरी हो सकती है। इस रिपोर्ट को अरशद परवेज और सुहास हरिनारायण ने तैयार किया है। इसमे कहा गया है कि किसानों के लिए सब्जी की खेती राहतभरी रही है। सब्जियों की खेती से 25-30 फीसदी ग्रामीण आय होती है, जबकि अनाज से 20 फीसदी की आय होती है।

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