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Lost Heritage Of Bihar: ऐतिहासिक धरोहर जो हुए गुमनामी का शिकार
बिहार में कई ऐतिहासिक धरोहरें हैं जो सरकार की अनदेखी की वजह से गुमनामी का शिकार हो चुकी हैं।
Inzamam Wahidi
छपरा जिले में मौजूद तीन सौ साल पुराना डच मकबरे का निर्माण ताजमहल की तर्ज़ पर हुआ था।
करिंगा गांव (छपरा शहर मुख्यालय से करीब 5 किलोमीटर दूर) स्थित डच मकबरा के खंडहर हो चुका है।
डच मकबरा के जीर्णोद्धार के लिए सरकार और पर्यटन विभाग की तरफ़ से कोई क़दम नहीं उठाया जा रहा है।
नालंदा जिले की 130 साल पुरानी लाइब्रेरी देशना गांव (अस्थावां प्रखंड) में मौजूद है।
अल-इल्लाह उर्दू लाइब्रेरी देखने के लिए देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद पहुंचे थे।
राज्य सरकार की बेरुखी से अल-इल्लाह उर्दू लाइब्रेरी का वजूद धीरे-धीरे खत्म हो रहा है।
1892 ई. में स्थापित की गई 130 साल पुरानी लाइब्रेरी खंडहर में तब्दील हो रही है।
बिहार के खगड़िया जिले में भी एक 'हवा महल' है, जो कि गुमनामी का शिकार हो चुका है।
ऐतिहासिक किलेनुमा महल का निर्माण 17वीं शताब्दी में सोलंकी वंश के राजा ने करवाया था ।
राजा बैरम सिंह (सोलंकी वंश के राजा, मध्य प्रदेश) ने मुगलकालीन कारीगर मो. बरकती मियां के हाथों से करवाया था।
हवा महल के निर्माण में राख, चूना और सुरखी का इस्तेमाल किया गया था। 52 कोठरी, 53 द्वार महल के नाम से भी यह धरोहर मशहूर है।
महल में 53 दरवाज़े और 52 कमरे हैं। 5 बीघा, 5 कट्ठा, 5 धुर और 5 धुरकी ज़मीन पर बनाया गया है।
आज की तारीख में भी चमत्कारी मंडप के चारों खंभे पर चोट करने पर कई किस्म की आवाज़ सुनाई देती है।
महल के अंदर रानी के नहाने के लिए तालाब, महल से मंदिर तक जाने के लिए सुंरग वाला रास्ता और दीवारों पर शानदार चित्रकारी और भी मौजूद है।
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