वाराणसी के सियासी संग्राम में प्रियंका के सहारे कांग्रेस, भाजपा सरकार की खोलेंगी पोल

वाराणसी। काशी में कांग्रेस का इतिहास बहुत समृद्ध रहा है। यहां से डा. संपूर्णानंद, कमलापति त्रिपाठी जैसे नेता न सिर्फ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, बल्कि उनकी कद्दावर शख्सियत ने उनके समय में देश की राजनीति की दिशा और दशा तय की। कमलापति के औरंगाबाद हाउस से आसपास के कई जिलों की राजनीति तय होती रही है। श्यामलाल यादव जैसे व्यक्तित्व ने केंद्र में बनारस का प्रतिनिधित्व किया तो राज्यसभा में दो बार उपसभापति भी रहे। इन सब के बावजूद धीरे-धीरे काशी में कांग्रेस का पतन होता गया। राम मंदिर आंदोलन के दिनों में कांग्रेस ने यहां से जो बढ़त गंवाई तो फिर पुराना रुतबा कभी हासिल नहीं कर सकी।

priyanka gandhi

वर्ष 2004 में डा. राजेश मिश्रा सांसद जरूर बने, लेकिन 2014 में नरेन्द्र मोदी यहां से सांसद और प्रधानमंत्री बने तो कांग्रेस की बची-खुची जमीन भी दरक गई। अब कांग्रेस को वाराणसी की बंजर राजनीतिक भूमि पर प्रियंका गांधी वाड्रा का सहारा है। पार्टी नेताओं-कार्यकर्ताओं ने प्रियंका द्वारा उठाए गए बेरोजगारी, महंगाई, महिला सुरक्षा, किसान आदि के मुद्दों के सहारे आगे बढऩे का मन बना लिया है।

बीते अक्टूबर में प्रियंका ने जगतपुर में जनसभा कर कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश भरने की कोशिश की थी। कठोर शब्दों में कहा था-रुकेंगे न थकेंगे, सत्ता परिवर्तन तक लड़ेंगे। आह्वान किया था-कंधे से कंधा मिलाएं। सत्ता परिवर्तन का संकल्प लें। मैं आपकी लड़ाई लडूंगी। सोनभद्र के उभ्भा गोलीकांड के सहारे पुलिस, प्रशासन व भाजपा पर आरोप मढ़े। पुलिस-प्रशासन व भाजपा को कठघरे में खड़ा किया। प्रियंका हाथरस की घटना के बहाने महिला सुरक्षा, लखीमपुर के बहाने किसान, गैस सिलेंडर के बहाने महंगाई का मुद्दा उठाती हैं। कोरोना मैनेजमेंट में सरकार को फेल बताती हैं। नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक ने इन मुद्दों को गांठ बांध लिया है। बात करने पर वे प्रियंका के उठाए मुद्दे को ही सिलसिलेवार गिनाते हैं। इससे स्पष्ट है कि विधानसभा चुनाव में उनकी रणनीति केंद्र की मोदी और प्रदेश की योगी सरकार को कठघरे में खड़ा करने का रहेगी।

विधानसभा चुनाव 2017 में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। गठबंधन में कांग्रेस को वाराणसी में पूरा सम्मान भी मिला। कांग्रेस को यहां की आठ में से चार सीट कैंट, शहर उत्तरी, दक्षिणी और पिंडरा मिलीं। कांग्रेस पिंडरा की सीटिंग सीट समेत चारों पर हारी। वैसे बाकी चार सीटों पर सपा भी हारी। मोदी के नाम के दम पर भाजपा ने स्वतंत्रता के बाद वाराणसी में अब तक की सबसे बड़ी जीत हासिल की और आठों सीटों पर कब्जा कर लिया। जबकि 1952 में हुए पहले आम चुनाव में जवाहर लाल नेहरू की आंधी में भी कांग्रेस एकीकृत वाराणसी की 11 में 10 सीटें ही जीत सकी थी। अब औरंगाबाद हाउस से भी कांग्रेस का झंडा उतर चुका है। उसकी पांचवीं पीढ़ी के झंडाबरदार ललितेशपति त्रिपाठी कांग्रेस छोड़ तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। इसे पार्टी को बड़ा झटका माना जा रहा है। हालांकि उनके अलग होने का प्रभाव बनारस से कहीं अधिक मीरजापुर की सीटों पर पड़ सकता है।

'हम लोग सबसे बड़ा मुद्दा महंगाई, बेरोजगारी, महिला सुरक्षा, कानून व्यवस्था और किसानों के मुद्दे को लेकर जनता के बीच जाएंगे। इससे हर आदमी त्रस्त है। साथ ही केंद्र व प्रदेश की सरकार ने धर्म का चोला ओढ़ कर जनता को भरमाने का जो कार्य किया है, उसकी भी पोल खुल गई है। जिस गंगा में प्रधानमंत्री ने डुबकी लगाई उसमें भी सीधे सीवर और नालों का पानी गिर रहा है।'

'प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र होने के बावजूद वाराणसी का विकास नहीं हुआ। उल्टे बनारस का गुजरातीकरण किया जा रहा है। कोरोना की दो लहर में काशी की जनता अनाथ बनी रही। जब कभी जरूरत पड़ी, यहां के लोग नेतृत्वविहीन महसूस करते हंै। इन समस्याओं के बीच हमने पार्टी कार्यकर्ताओं के सहारे लोगों को दवा, राशन, चप्पल, कपड़े आदि से जनता की मदद की। इन मुद्दे को लेकर हम लोगों के बीच जाएंगे। हमें पूरा विश्वास है कि आगामी चुनाव में बहुत ही सार्थक परिणाम होंगे।'
-राघवेंद्र चौबे, महानगर अध्यक्ष कांग्रेस, वाराणसी।

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